आज सात जनवरी है , मेरा दर्द

07 जनवरी 2021   |  शोभा भारद्वाज   (3308 बार पढ़ा जा चुका है)

आज सात जनवरी है मेरा दर्द

डॉ शोभा भारद्वाज

आन्दोलन के नाम पर शर्ते मनवाने के लिए सड़के रोक लेना कभी इस जाम में फंसी सीरियस रोगियों ,प्रसव पीड़ा से तड़पती महिलाओं को ले जाती एम्बूलेंस , थ्रीव्हीलर या गाड़ियां जिनमें सीरियस मरीज निराशा से रास्ता रोके खड़े लोगों के सामने गिड़गिड़ाते स्वजन प्लीज रास्ता दे दीजिये हमारा मरीज मर जायेगा आपने भी देखे होंगे जबाब में हमारी मांगे पूरी करों के नारे .प्रजातंत्र में सरकार पर दबाब डालने की कैसी आजादी या भीड़ तन्त्र देख कर शर्म आती है?

मेरा अपना दर्द है नासूर बना घाव अक्सर टीस उठती है . छह जनवरी बसों की हड़ताल अचानक शुरू हुई रास्ते में आड़ी तिरछी बसें रोक दी रास्ते पूरी तरह बंद कर दिये . उन दिनों मैं स्टूडेंट थी मंडी हाउस पर स्थित लायब्रेरी में रोज सुबह आठ बजे थीसिस का काम पूरा करने के लिए जाती थी मैं प्रिगनेंट थे सातवाँ महीना शुरू होने में कुछ दिन बाकी थे खतरा भी नहीं था. डाक्टर पति रात की ड्यूटी ,सुबह बारह बजे तक ओपीडी में व्यस्त थे अचानक सूचना मिली बसों की हड़ताल हो गयी रास्ते बंद कर रहे हें यह तुरंत थ्रीव्हीलर से लायब्रेरी पहुंचे थ्री व्हीलर खड़ा किया जल्दी से हम निकलना चाहते थे सड़के बंद कर ड्राईवर कंडकटर वहां से नारे लगाने चले गये . सवारियों की भारी भीड़ थी निकलने का कोई रास्ता नहीं था हम साईड लेन से पैदल आईटीओ पहुंचे सब रास्ते जाम किये हुए किसी तरह आईटीओ से पुल पार किया अंदर की गलियों में कहीं रिक्शा मिला कहीं बंद फिर रिक्शा फिर पैदल हल्की बारिश भी शुरू हो गयी बड़ी मुश्किल से घर तक पहुंची .

रजाई लपेट कर बिस्तर में लेट गयी हीटर के बाद भी कांपती रही मजबूर थे हम . शाम बीत गयी रात हो गयी फिर आधी रात मैं पीड़ा से तड़फने लगी आसपास एक नर्सिंग होम था लेकिन इन्होने अस्पताल ले जाना उचित समझा पुलिस के डाक्टर थे बीट कांस्टेबल की मदद से स्कूटर का जुगाड़ किया रास्ते अब भी बंद थे परन्तु जाम खत्म हो गया फिर भी मुश्किल से अस्पताल पहुंचे तुरंत लेबर रूम ले जाया गया मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या हो रहा था ? गायनाकोलोजिस्ट से मेडिकल टर्म में इन्होने पूछा जबाब था कुछ नहीं हो सकता इंतजार करना पड़ेगा काली रात, बारिश शुरू हो गयी रह – रह कर दर्द का सैलाब ऐसा कष्ट मुझे ही झेलना था .राजनीति शास्त्र में पढ़ा पढ़ाया मौलिक अधिकारों में अभिव्यक्ति का अधिकार कुछ याद नहीं था .सबके कहने पर भी यह डाक्टर्स के कमरे नहीं गये लेबर रूम के बाहर बैठे थे बदन पर पूरे गर्म कपड़े भी नहीं थे .कुछ देर बाद माथे पर इनका या डाक्टर का हाथ महसूस होता था में पूछती क्या बेबी बच जाएगा जबाब में माथे पर हल्की थपकी . शायद पांच बजे थे पीड़ा बढ़ गयी मैने आंख उठा कर देखा डाक्टर के हाथ में बेबी ब्वाय था उसने दो हिचकियाँ ली खत्म ,कोशिश की गयी कुछ नहीं हुआ मैं सुन्न हो गयी उन्हें खड़े देखा नर्स ने गौज में लपेट कर बच्चा इनको दे दिया .इन्होने कहा कुछ देर बाद आ सकूंगा आप चिंता न करें हम दो घटे बाद रूम में शिफ्ट कर देंगे . मैं गहरी नींद में डूब गयी नींद थी या निराशा . मेरी आँख खुली मैं अस्पताल के बिस्तर पर थी एक नर्स मेरे पास बैठी थी , मैं फिर सो गयी यह आये मेरे सिर पर हाथ रक्खा मैं स्पर्श से समझ गयी मैने पूछा जब आप बेबी को लेकर गये थे क्या गर्म था ? नहीं फिर भी दो घटे इंतजार किया.

रात को नींद में मुझे ऐसा महसूस हुआ मैं डोर के सहारे लटकी हूँ मुझे कीड़े खा रहे हैं भय से चीख निकल गयी . जब छुट्टी मिली हड़ताल खत्म हो गयी थी दिल्ली अपनी गति से चल रही थी . पूछने पर इन्होने बताया जब यह लिपटे शव को लेकर बाहर आये हड़ताल और जाम ,पहला मुसाफिर हाथ में नवजात का शव कोई थ्रीव्हीलर ले जाने को तैयार नहीं हुआ एक गावँ का बूढ़ा रिक्शेवाले आगे आया चलिए बाबू जी मैं आपको ले चलता हूँ कहीं निकलने का रास्ता नहीं था रिक्शेवाले ने समझाया यह बच्चा नहीं मिटटी है आपको मैं किसी तरह निकाल कर यमुना जी की तरफ ले जाता हूँ वहाँ तेज धारा है लोग यहीं ऐसे बच्चे के शवो को बहाते हैं .मजबूरी यमुना के किनारे और भी लोग खड़े थे वह नवजात बच्चे का शव लेकर आये थे उनका भी हमारे जैसा दर्द था उन्होंने आगे जाकर यमुना की धारा में नवजात को समर्पित कर दिया इनको समझाया और कोइ चारा नहीं है इन्होने ऐसा करते समय कहा कहां ‘त्तू मुझे कंधा देता आज मेरा दुर्भाग्य.

प्रजातंत्र का यह कौन सा हथियार है रास्ता रोक लेना शाहीन बाग़ में महत्वपूर्ण सड़क रोकी हुई थी टीवी में देखा एक बेटा गिड़गिड़ा रहा था रास्ता दे दीजिये मेरे पिता को अटैक आया है रास्ता नहीं दिया उस पिता की मृत्यू हो गयी ऐसे अनगिनत दुःख मेरे अपने बन गये . आज सात जनवरी है वैसी ही ठंड रास्ता रोके किसान उनके नेताओं का एक ही नारा है पहले तीनों कानून हटा दो फिर हमारी और मांगे पूरी करे . प्रायोजित धरना पीछे स्पोंसरर और पैसा . हमारा मौलिक अधिकार कहां है ?

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