अशान्तस्य कुतो सुखम् :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

10 जनवरी 2021   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (428 बार पढ़ा जा चुका है)

अशान्तस्य कुतो सुखम् :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर द्वारा बनाया गया यह संसार बहुत की रहस्यमय है ` इस संसार को अनेक उपमा दी गई हैं | किसी ने इसे पुष्प के समान माना है तो किसी ने संसार को ही स्वर्ग मान लिया है | वेदांत दर्शन में संसार को स्वप्नवत् कहा गया है तो गोस्वामी तुलसीदास जी इस संसार को एक प्रपंच मानते हैं | गौतम बुद्ध जी के दृष्टिकोण से यह संसार दुखों का मूल है | इन सभी को यदि मिलाकर देखा जाए तो वास्तव में संसार दु:खालय ही दिखाई पड़ता है | ना चाहते हुए भी मनुष्य जीवन में अनेक दुरूह समस्याओं से घिरा हुआ नजर आता है | प्रत्येक मनुष्य प्रयास तो करता है सुख प्राप्त करने का परंतु उसे दुख घेर लेते हैं ` मनुष्य के दुख का कारण उसकी अतृप्त कामनाएं होती है , प्रत्येक मनुष्य सुख सुविधा की कामना करता है परंतु उसे अशांति ही प्राप्त होती है क्योंकि सब कुछ अपने अनुकूल नहीं मिल सकता | हमारे शास्त्रों में कहा गया है "अशांतस्य कुतो सुखम्" अर्थात अशांत व्यक्ति को सुख कैसे मिल सकता है ? मनुष्य जीवन भर अपनी कामनाओं , वासनाओं एवं आकांक्षाओं की तृप्ति के लिए दौड़ता रहता है परंतु जब वह पीछे मुड़कर देखता है तो उसे पश्चाताप होता है कि उसने अपने जीवन को व्यर्थ में गवा दिया | यदि विचार किया जाय कि दुख क्या है ? तो उत्तर यही होगा कि मनुष्य की अतृप्त कामनाएं ही दुख का कारण होती है | संसार को न समझ पाने के कारण मन में उपजी भ्रांति माया का रूप ले लेती है और मानसिक उद्विग्नता परिणाम के रूप में हमारा पीछा जीवन के हर मोड़ पर करती नजर आती है | प्रत्येक मनुष्य संसासार को अपने अनुकूल करना चाहता है जबकि यह संसार किसी के संभाले संभलने वाला नहीं है | वास्तव में शांति एवं तृप्ति मनुष्य को तभी प्राप्त हो सकती है जब उसकी मानसिकता एवं दृष्टिकोण परिवर्तित हो जाय | परिस्थितियां चाहे जितनी अनुकूल हो जाएं परंतु जब तक मनुष्य की मानसिकता एवं दृष्टिकोण नहीं परिवर्तित होगा तब तक मनुष्य को सुख एवं शांति कदापि नहीं प्राप्त हो सकती |*


*आज सारे संसार में अनेक सुख सुविधाएं होने के बाद भी प्रत्येक मनुष्य दुखों से घिरा हुआ ही दिखाई पड़ता है , क्योंकि आज किसी को भी संतोष नहीं है | किसी को किसी प्रियजन की बातों से दुख हो जाता है , किसी को किसी के कार्य से दुख हो जाता है , किसी को इस बात का दुख होता है कि लोग हमारी बात को नहीं मान रहे हैं | दुखों के इस भंवर जाल में मनुष्य इसलिए फस गया है क्योंकि वह सब कुछ अपने अनुसार करना चाहता है | ऐसे विकट समय को देखते हुए मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इस विकट समस्या का समाधान यही जान पाया हूँ कि मनुष्य यदि अपने मन को परिवर्तित कर ले तो उसके दुखों का अंत हो सकता है | "योग वशिष्ट महारामायण" एक प्रसंग मिलता है कि जिस प्रकार भीगी हुई लकड़ियां आग को नहीं जला सकती उसी प्रकार यदि मनुष्य अपने मन को परिवर्तित करके अपने मन को ज्ञान से सिक्त कर ले तो आत्मज्ञान से भीगे हुए ज्ञानी जनों को मानसिक वेदना कभी पीड़ित नहीं कर सकती | ज्ञान के द्वारा ही मनुष्य के दुखों का अंत हो सकता है | जो भी मनुष्य ज्ञान की इस नौका पर सवार हो जाता है वह संसार सागर को चीरकर पार चला जाता है | दुख से घिरे इस संसार से उबरने का एक ही मार्ग है कि मनुष्य सांसारिकता के अतिरिक्त ज्ञान भी प्राप्त करने का प्रयास करें | यदि मनुष्य बाहर के नित्य नूतन संसाधनों की दौड़ में पड़ने के स्थान पर आत्मिक शांति के लिए प्रयास करें तो उसे दुख कभी भी व्यथित नहीं कर सकता क्योंकि सुख उसे ही प्राप्त हो सकता है जिसके मन में शांति है , जिसके मन में संतोष है , अन्यथा मनुष्य जीवन भर दुखों के भंवर जाल में डूबता उतराता रहता है | मनुष्य के दुखों का यही कारण है कि संसार के अनेक संसाधनों पर नियंत्रण करने वाला मनुष्य अपने मन पर नियंत्रण करने में असफल हो रहा है | जिस दिन मनुष्य अपने मन पर नियंत्रण कर के अपना दृष्टिकोण परिवर्तित कर देता है उसी दिन उसके सारे दुख स्वत: समाप्त हो जाते हैं |*


*जीवन में सुख व शांति प्राप्त करने के लिए भौतिक संसाधनों की बहुत ज्यादा आवश्यकता नहीं होती है आवश्यकता होती है कि मनुष्य के जीवन का उद्देश्य स्पष्ट हो | जिस दिन मनुष्य अपने जीवन का उद्देश्य जान जाता उसी दिन उसे असीम शांति प्राप्त होती है और वह सुख का अनुभव करने लगता है |*

अगला लेख: मानस रोग :- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
10 जनवरी 2021
*इस धरा धाम में आने के बाद मनुष्य स्वयं को समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए अपने व्यक्तित्व का विकास करना प्रारंभ करता है , परंतु कभी-कभी वह दूसरों के व्यक्तित्व को देखकर उसका मूल्यांकन करने लगता है | यहीं पर वह छला जाता है | ऐसा मनुष्य इसलिए करता है क्योंकि दूसरों के जीवन में तांक - छांक करने की मनु
10 जनवरी 2021
02 जनवरी 2021
*परमपिता परमात्मा ने सुंदर सृष्टि की रचना करके मनुष्य को धरती पर भेजा , सुंदर शरीर के साथ सुंदर एवं तर्कशील बुद्धि प्रदान कर दी परंतु मनुष्य इस संसार में आकर के तरह-तरह के आडंबर (छद्मवेष) करता है | अपने वास्तविक स्वरूप का त्याग करके आडंबर बनाकर समाज के साथ छल करता है | वह शायद नहीं जानता कि आडंबर
02 जनवरी 2021
29 दिसम्बर 2020
*सनातन धर्म में मानव जीवन को चार भागों में विभक्त किया गया :- ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ एवं सन्यास | सन्यास का लक्ष्य होता है परमात्मा की प्राप्ति , सन्यास लेना बहुत ही कठिन है | प्रायः मनुष्य को जब किसी भावनात्मक चोट से , स्वयं के विचार से वाह्य भौतिक जगत से मोहह टूटता है तो व्यक्ति स्वयं औ
29 दिसम्बर 2020
19 जनवरी 2021
*जब से इस धरा धाम पर सृष्टि का विस्तार हुआ तभी से यहां सनातन धर्म का प्रसार हुआ | सनातन का अर्थ ही होता है शाश्वत अर्थात जो आदिकाल से है | सनातन धर्म अपने आप में अद्भुत इसलिए है क्योंकि सनातन धर्म के महापुरुषों ने जिस ज्ञान - विज्ञान का प्रसाद इस धरा धाम पर किया उसका लाभ मानव आज तक ले रहा है | सनातन
19 जनवरी 2021
28 दिसम्बर 2020
*मानव जीवन में सामाजिकता , भौतिकता एवं वैज्ञानिकता के विषय में अध्ययन करना जितना महत्वपूर्ण है , उससे कहीं महत्वपूर्ण है स्वाध्याय करना | नियमित स्वाध्याय जीवन की दिशा एवं दशा निर्धारित करते हुए मनुष्य को सद्मार्ग पर अग्रसारित करता है | स्वाध्याय का अर्थ है :- स्वयं क
28 दिसम्बर 2020
10 जनवरी 2021
*मानव जीवन में प्रकृति का बहुत ही सराहनीय योगदान होता है | बिना प्रकृति के योगदान के इस धरती पर जीवन संभव ही नहीं है | यदि सूक्ष्मदृष्टि से देखा जाए तो प्रकृति का प्रत्येक कण मनुष्य के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है | प्रकृति के इन्हीं अंगों में एक महत्वपूर्ण एवं विशेष घटक है वृक्ष | वृक्ष का मानव
10 जनवरी 2021
15 जनवरी 2021
*इस संसार में आने के बाद मनुष्य जीवन भर विभिन्न प्रकार की संपदाओं का संचय किया करता है | यह भौतिक संपदायें मनुष्य को भौतिक सुख तो प्रदान कर सकती हैं परंतु शायद वह सम्मान ना दिला पायें जो कि इस संसार से जामे के बाद भी मिलता रहता है | यह चमत्कार तभी हो सकता है जब मनुष्य का चरित्र श्रेष्ठ होता है , क्
15 जनवरी 2021
10 जनवरी 2021
*जब से इस धरा धाम पर मनुष्य का सृजन हुआ है तब से लेकर आज तक अनेकों प्रकार के मनुष्य इस धरती पर आये और चले गये | वैसे तो ईश्वर ने मानव मात्र को एक जैसा शरीर दिया है परंतु मनुष्य अपनी बुद्धि विवेक के अनुसार जीवन यापन करता है | ईश्वर का बनाया हुआ यह संसार बड़ा ही अद्भुत एवं रहस्यम है | यहाँ मनुष्य के म
10 जनवरी 2021
19 जनवरी 2021
*इस धरा धाम पर हमें सर्वश्रेष्ठ मानवयोनि प्राप्त हुई है | हम इस जीवन में जो कुछ भी करना चाहें कर सकते हैं | परंतु किसी भी कार्य में सफल होने के लिए आवश्यक है आत्मनिरीक्षण करना | इस जीवन में भौतिक , शारीरिक , बौद्धिक या आर्थिक किसी भी दृष्टि से विकास के लिए आत्मनिरीक्षण करना अनिवार्य प्रक्रिया है , ज
19 जनवरी 2021
01 जनवरी 2021
*सनातन धर्म एवं उसकी मान्यताएं इतनी दिव्य रही हैं कि वर्ष का प्रत्येक दिन , महीना एवं वर्षारंभ सब कुछ प्रकृति के अनुसार मनाए जाने की परंपरा सनातन धर्म में देखी जा सकती है | जब प्रकृति अपना श्रृंगार कर रही होती है तब सनातन धर्म का नव वर्ष मनाया जाता है | बारह महीनों में चैत्र माह को मधुमास कहा गया है
01 जनवरी 2021
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x