आत्म मूल्यांकन करना आवश्यक है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

10 जनवरी 2021   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (399 बार पढ़ा जा चुका है)

आत्म मूल्यांकन करना आवश्यक है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम में आने के बाद मनुष्य स्वयं को समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए अपने व्यक्तित्व का विकास करना प्रारंभ करता है , परंतु कभी-कभी वह दूसरों के व्यक्तित्व को देखकर उसका मूल्यांकन करने लगता है | यहीं पर वह छला जाता है | ऐसा मनुष्य इसलिए करता है क्योंकि दूसरों के जीवन में तांक - छांक करने की मनुष्य की प्रवृत्ति होती है | प्रायः दूसरों का मूल्यांकन किया जाता रहता है जिसके परिणाम स्वरूप मनुष्य दूसरे की बराबरी करने का प्रयास करता है और जब वह बराबरी नहीं कर पाता तो उसमें मानसिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं | इन विकारों से बचने के लिए जरूरी है कि मनुष्य दूसरों के स्थान पर स्वयं का मूल्यांकन करें क्योंकि स्वयं का मूल्यांकन या आत्म विश्लेषण एक ऐसा दृष्टिकोण होता है जिसमें व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की सहायता के बिना अपने व्यक्तित्व को समझ सकता है | यह एक कटु सत्य है कि स्वयं का मूल्यांकन किए बिना मनुष्य प्रगति के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता है क्योंकि मनुष्य सही मायने में केवल अपने आप को ही जानता है | समय-समय पर स्वयं का मूल्यांकन करके मनुष्य मानसिक विकारों से बच सकता है क्योंकि यदि कोई शारीरिक व्याधि होती है तो मनुष्य को पता चल जाता है | जैसे :- बुखार हुआ तो शरीर गर्म हो जाता है , चोट लगती है तो दर्द होता है घाव हो जाता है तो वह दिखाई पड़ता है परंतु मानसिक रोग या विकार कब मनुष्य को जकड़ लेते हैं वह स्वयं नहीं जान पाता | यहीं पर मनुष्य को आत्म चिंतन या आत्म मूल्यांकन की आवश्यकता होती है | इसके माध्यम से ही वह अपने मानसिक समस्याओं को पहचान सकता है | दूसरों से अपना मूल्यांकन करना कदापि गलत नहीं है परंतु यह भी आवश्यक है कि जब किसी दूसरे व्यक्ति के व्यक्तित्व व्यवहार के बारे में हम विचार करें और किसी निष्कर्ष पर पहुंचे तो कुछ पल रुक कर के उन्ही विषयों पर स्वयं के व्यक्तित्व को भी आंकना चाहिए कि उस व्यक्ति के व्यक्तित्व के समान अपना व्यक्तित्व बनाने के लिए हमें क्या करना चाहिए या क्या करना उचित होगा | जो मनुष्य समय-समय पर आत्म मूल्यांकन किया करता है वही जीवन में सब कुछ प्राप्त कर पाता है | आत्म मूल्यांकन ही व्यक्तित्व विकास का मुख्य साधन है |*


*आज के युग को वैज्ञानिक युग कहा जा रहा है परंतु इस वैज्ञानिक युग में भी हमारे पूर्वज ऋषियो - महार्षियों के द्वारा कही गई बात को उनके दिशा निर्देश को नकारा नहीं जा सकता है ` यदि हम आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से देखें तो एक व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य कई जटिल अंतर्वैयक्तिक और सामाजिक प्रक्रियाओं के गत्यात्मक पहलुओं पर निर्भर करता है , परंतु यदि व्यक्ति चेतना के स्तर पर थोड़ा प्रयास करें तो स्वयं को मानसिक स्तर पर स्वस्थ रख सकता है | आत्म मूल्यांकन के द्वारा ही मनुष्य अपने जीवन को सार्थक कर सकता है | दूसरों को या उनके कार्यों को देखने की अपेक्षा मनुष्य को सर्वप्रथम स्वयं का मूल्यांकन एवं अवलोकन करना चाहिए क्योंकि जब मनुष्य अपने मनोभावों पर नियंत्रण नहीं कर पाता है तो वह मनोविकार बन जाते हैं | और मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि मानसिक रोग एवं मनोविकार जैसे :- अवसाद , उन्माद और उद्दंडता आदि तभी प्रकट होते हैं जब हम दूसरों का मूल्यांकन एवं विश्लेषण करने लगते हैं क्योंकि ऐसा करने वाले किसी दूसरे के नकारात्मक पहलुओं का ही नित्य मूल्यांकन करते हैं और असंतुलित मानक तय कर दूसरों से स्वयं की तुलना करने लगते हैं | अंततः यह असंतुलित मूल्यांकन व्यक्ति को जीवन के उस मोड़ पर ले जाता है जहां से वापस आना बहुत कठिन हो जाता है | कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि वह जिस मनुष्य से अपना मूल्यांकन करता है व जिस मनुष्य से स्वयं की तुलना करता है वह लोग उससे कमतर होकर भी अधिक सफल हो जाते हैं और जब ऐसा होता है तो मनुष्य उनकी बराबरी करने के लिए कोई भी मार्ग अपनाने लगता है | ऐसे में मनुष्य को विचार करना चाहिए कि वह मूल्यांकन तो कर रहा है परंतु उसे मूल्यांकन कि नहीं बल्कि आत्म मूल्यांकन की आवश्यकता है क्योंकि आत्म मूल्यांकन करके ही मनुष्य नकारात्मक होने से बच सकता है | जब तक हम स्वयं अपने मन के मालिक नहीं होंगे तब तक आत्म विश्लेषण या आत्म मूल्यांकन करने में सक्षम नहीं हो सकते और मन की चंचलता के कारण दूसरों का मूल्यांकन करने में जीवन व्यतीत कर देते हैं | ऐसा ना होने पाए इसलिए प्रत्येक मनुष्य को आत्म मूल्यांकन करते हुये स्वयं के व्यक्तित्व का विकास करने का प्रयास करना चाहिए |*


*प्रायः लोग दूसरों की तरह बनना चाहते हैं परंतु सत्य ही है कि ईश्वर ने सबको एक भिन्न मौलिकता प्रदान की है | उसी विशेष उपहार को आत्म मूल्यांकन के द्वारा निखार कर अपनी कमियों को दूर करते हुए व्यक्तित्व का समग्र विकास करना चाहिए |*

अगला लेख: मानस रोग :- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
10 जनवरी 2021
*मानव जीवन में प्रकृति का बहुत ही सराहनीय योगदान होता है | बिना प्रकृति के योगदान के इस धरती पर जीवन संभव ही नहीं है | यदि सूक्ष्मदृष्टि से देखा जाए तो प्रकृति का प्रत्येक कण मनुष्य के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है | प्रकृति के इन्हीं अंगों में एक महत्वपूर्ण एवं विशेष घटक है वृक्ष | वृक्ष का मानव
10 जनवरी 2021
02 जनवरी 2021
*परमपिता परमात्मा ने सुंदर सृष्टि की रचना करके मनुष्य को धरती पर भेजा , सुंदर शरीर के साथ सुंदर एवं तर्कशील बुद्धि प्रदान कर दी परंतु मनुष्य इस संसार में आकर के तरह-तरह के आडंबर (छद्मवेष) करता है | अपने वास्तविक स्वरूप का त्याग करके आडंबर बनाकर समाज के साथ छल करता है | वह शायद नहीं जानता कि आडंबर
02 जनवरी 2021
28 दिसम्बर 2020
*मानव जीवन अत्यनेत दुर्लभ है , इस सुंदर शरीर तो पाकरके मनुष्य के लिए कुछ भी करना असम्भव नहीं है | किसी भी कार्य में सफलता का सफल सूत्र है निरंतर अभ्यास | प्राय: लोग शिकायत करते हैं कि मन तो बहुत होता है कि सतसंग करें , सदाचरण करें परंतु मन उचट जाता है | ऐसे लोगों को स
28 दिसम्बर 2020
10 जनवरी 2021
*मानव जीवन बहुत ही दुर्लभ है , यह जीवन जितना ही सुखी एवं संपन्न दिखाई पड़ता है उससे कहीं अधिक इस जीवन में मनुष्य अनेक प्रकार के भय एवं चिंताओं से घिरा रहता है | जैसे :- स्वास्थ्य हानि की चिंता व भय , धन समाप्ति का भय , प्रिय जनों के वियोग का भय आदि | यह सब भय मनुष्य के मस्तिष्क में नकारात्मक भाव प्र
10 जनवरी 2021
28 दिसम्बर 2020
*मानव जीवन में सामाजिकता , भौतिकता एवं वैज्ञानिकता के विषय में अध्ययन करना जितना महत्वपूर्ण है , उससे कहीं महत्वपूर्ण है स्वाध्याय करना | नियमित स्वाध्याय जीवन की दिशा एवं दशा निर्धारित करते हुए मनुष्य को सद्मार्ग पर अग्रसारित करता है | स्वाध्याय का अर्थ है :- स्वयं क
28 दिसम्बर 2020
19 जनवरी 2021
*जब से इस धरा धाम पर सृष्टि का विस्तार हुआ तभी से यहां सनातन धर्म का प्रसार हुआ | सनातन का अर्थ ही होता है शाश्वत अर्थात जो आदिकाल से है | सनातन धर्म अपने आप में अद्भुत इसलिए है क्योंकि सनातन धर्म के महापुरुषों ने जिस ज्ञान - विज्ञान का प्रसाद इस धरा धाम पर किया उसका लाभ मानव आज तक ले रहा है | सनातन
19 जनवरी 2021
10 जनवरी 2021
*जब से इस धरा धाम पर मनुष्य का सृजन हुआ है तब से लेकर आज तक अनेकों प्रकार के मनुष्य इस धरती पर आये और चले गये | वैसे तो ईश्वर ने मानव मात्र को एक जैसा शरीर दिया है परंतु मनुष्य अपनी बुद्धि विवेक के अनुसार जीवन यापन करता है | ईश्वर का बनाया हुआ यह संसार बड़ा ही अद्भुत एवं रहस्यम है | यहाँ मनुष्य के म
10 जनवरी 2021
28 दिसम्बर 2020
*इस धरा धाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य अनेक प्रकार के भोग भोगता हुआ पूर्ण आनंद की प्राप्ति करना चाहता है | मनुष्य को पूर्ण आनंद तभी प्राप्त हो सकता है जब उसका तन एवं मन दोनों ही स्वस्थ हों | मनुष्य इस धरा धाम पर आने के बाद अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित हो जाता है तब वह उसकी चिकित्सा किसी चिकित्सक स
28 दिसम्बर 2020
21 जनवरी 2021
*इस धरा धाम पर आने के बाद मनुष्य अनेकों प्रकार के कर्म करता रहता है क्योंकि ईश्वर ने उसे कर्म करने का अधिकार प्रदान कर रखा है | कर्म करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है परंतु यहां एक प्रश्न मस्तिष्क में उठता है कि जब कर्म करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है और मनुष्य उसे कर भी रहा है तो पाप कर्म एवं पुण्य
21 जनवरी 2021
10 जनवरी 2021
*मानव जीवन बहुत ही दुर्लभ है , यह जीवन जितना ही सुखी एवं संपन्न दिखाई पड़ता है उससे कहीं अधिक इस जीवन में मनुष्य अनेक प्रकार के भय एवं चिंताओं से घिरा रहता है | जैसे :- स्वास्थ्य हानि की चिंता व भय , धन समाप्ति का भय , प्रिय जनों के वियोग का भय आदि | यह सब भय मनुष्य के मस्तिष्क में नकारात्मक भाव प्र
10 जनवरी 2021
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x