नयी उम्मीदें

17 जनवरी 2021   |  Tripti Srivastava   (9 बार पढ़ा जा चुका है)

खुद ही से मैं नज़रें चुराने लगी हूं,

उन यादों से दामन छुड़ाने लगी हूँ ।


खुद ही से खुद ही का पता पूछती हूँ,

न जाने कहाँ मैं विलीन हो चुकी हूँ ।


अरमानों को अपने दबाने लगी हूँ,

पहचान अपनी भुलाने लगी हूँ ।


भटकने लगी राह मंज़िल की अपनी,

कहूँ क्या किधर थी, किधर को चली हूँ ।


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