अशरीरी शब्द

18 फरवरी 2021   |  chander prabha sood   (399 बार पढ़ा जा चुका है)

  अशरीरी शब्द

हर शब्द को यथासम्भव सदा सम्हलकर ही बोलना चाहिए। शब्द का कोई भी मूर्त रूप नहीं होता यानी हमारी तरह उनके शरीर या हाथ-पाँव नहीं होते। इसलिए हम इन्सानों की तरह वे हाथों-पैरों से झगड़ा नहीं करते और न ही हथियार चलाकर किसी को घायल कर सकते हैं अथवा किसी की जान ले सकते हैं।
          ये अशरीरी शब्द यानी शरीरधारी न होते हुए भी अपने सामने वाले को गम्भीर घाव दे जाते हैं। उन घावों की टीस आजन्म मनुष्य के मन को आहत करती रहती है। निम्न दोहे में बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
मधुर वचन हैं औषधि, कटुक वचन हैं तीर।
 स्रवण द्वार होई संचरे, वैधे सकल सरीर।।
अर्थात् मधुर वचन औषधि की तरह होते हैं, पर कड़वे वचन तीर की तरह होते हैं। सुनाई कानों से देते हैं पर सारे शरीर को बेध देते हैं।
            दूसरी ओर ऐसे शब्द भी हैं जो औषधि की तरह दूसरे की चोट पर मलहम लगाते हैं और सान्त्वना देते हैं। ये मधुर वचन कल्पवृक्ष और कामधेनु के समान होते हैं जो पलक झपकते ही मनुष्य की मनोकामनाओं को पूर्ण कर देते हैं। ये दुखी और पीड़ित व्यक्ति को कष्ट से राहत दिलाने का भरसक प्रयास करते हैं।
          शब्द बहुत अमूल्य होते हैं। इनका प्रयोग करते समय सावधानी बरतनी चाहिए इसीलिए कहा है- 'पहले तोलो फिर बोलो।' यानी जिन शब्दों का प्रयोग करना चाहता है, बहुत सोच-समझकर उन्हें बोलना चाहिए। मनीषी कहते हैं तीर का घाव भर जाता है पर शब्दों द्वारा दिया गया घाव नहीं भरता।
        इसी भाव को इस दोहे में बहुत सरल शब्दों में समझाया है-
   बोली एक अमोल है जो कोई बोले आन।
  हिय तराजू तौल के तव मुख बाहर आन।
अर्थात् बोली या शब्द अनमोल होते हैं। उन्हें मन के तराजू में तोलकर ही अपने मुँह से बाहर निकालना चाहिए। यानी शब्दों को बैलेंस करके बोलना चाहिए, इसी में समझदारी होती है।
            बिहारी कवि के दोहों की तरह ये शब्द छोटे होते हुए भी गम्भीर घाव करते हैं। जब घाव नासूर बन जाते हैं, तब किसी भी मनुष्य की सहनशक्ति सीमा को पार कर जाती है, जिसका परिणाम भयंकर होता है। इसी के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी शत्रुता निभाई जाती है। शत्रु पक्ष को अधिकाधिक जान और माल की हानि पहुँचाने का प्रयास किया जाता है।
          स्वर्ण मृग को पकड़ने गए भगवान राम की करुण पुकार का लक्ष्मण पर कोई प्रभाव न होने पर, उसे भगवती सीता ने कठोर वचन कहे। फिर लाचार लक्ष्मण के प्रस्थान कर जाने के पश्चात रावण उन्हें हरकर ले गया। इसका दुष्परिणाम राम-रावण युद्ध था।
          दुर्योधन को कहे गए द्रौपदी के अपशब्दों के कारण महाभारत काल में विनाश का ताण्डव हुआ। जिसे भगवान  श्रीकृष्ण भी नहीं बचा सके।
        अपने अधीनस्थों और छोटों के लिए भी न तो कभी व्यंग्य बाण चलाने चाहिए और न ही अपशब्द बोलने चाहिए। ऐसा करने वाले मनुष्य को तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। समय-समय पर उनका उपहास भी किया जाता है।
        इन शब्दों के मर्मभेदी बाण चलाकर मनुष्य अपने मित्रों को शत्रु बना लेता है। इसके विपरीत सद् वचनों के प्रभाव से शत्रु को भी मित्र बना लेता है। यह सब शब्दों की शक्ति है जो मनुष्य से उसका मनचाहा करवा लेती है। इसे आम भाषा में हम चाटुकारिता या चापलूसी भी कह सकते हैं। चापलूसी एकाध बार तो किसी को मोह सकती है, हमेशा नहीं।
          अनावश्यक ही क्षणिक आवेश में आकर मनुष्य को कभी अनर्गल प्रलाप नहीं करना चाहिए। ऐसा करने वाले इन्सान को कहीं भी सम्मान नहीं मिलता। फिर धीरे-धीरे लोग उसके बोलने की परवाह करना छोड़ देते हैं। फिर उससे किनारा करने में परहेज नहीं करते।
          स्वयं पर और अपने शब्दों पर जो संयम रखते हैं वही व्यक्ति संसार में मान्य होते हैं। यही लोग लोकप्रिय बनते हैं। हर कोई उनका साथ पाने के लिए लालायित रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद

अगला लेख: डिप्रेशन या अवसाद



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
30 जनवरी 2021
मर्यादा का पालनस्त्री हो या पुरुष मर्यादा का पालन करना सबके लिए आवश्यक होता है। घर-परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, बच्चों और सेवक आदि सबको अपनी-अपनी मर्यादा में रहना होता है। यदि मर्यादा का पालन न किया जाए तो बवाल उठ खड़ा होता है, तूफान आ जाता है। मर्यादा शब्द भगवान श्रीराम के साथ जुड़ा हुआ है।
30 जनवरी 2021
04 फरवरी 2021
प्
प्रैशर से खो रहा बचपनछोटे-छोटे बच्चों पर भी आज प्रैशर बहुत बढ़ता जा रहा है। उनका बचपन तो मानो खो सा गया है। जिस आयु में उन्हें घर-परिवार के लाड-प्यार की आवश्यकता होती है, जो समय उनके मान-मुनव्वल करने का होता है, उस आयु में उन्हें स्कूल में धकेल दिया जाता है। अपने आसपास देखते हैं कि इसलिए कुकु
04 फरवरी 2021
05 फरवरी 2021
ना
नामी स्कूलों का मोहसब माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे किसी नामी स्कूल में पढ़कर अपना जीवन संवार लें और बड़ा आदमी बन सकें। अपनी तरफ से वे हर सम्भव प्रयास भी करते हैं। स्कूल में दी जाने वाली मोटी फीस आदि का प्रबन्ध करते हैं। इस तथ्य को हम झुठला नहीं सकते कि पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चे होशियार
05 फरवरी 2021
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x