दूसरों की निन्दा

22 फरवरी 2021   |  chander prabha sood   (393 बार पढ़ा जा चुका है)

दूसरों की बुराई

हर इन्सान में अच्छाई और बुराई दोनों ही का समावेश होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि किसी मनुष्य में केवल अच्छाइयाँ ही हों और दूसरे में केवल बुराइयाँ ही हों। यदि मनुष्य में कोई भी कमी नहीं होगी तो फिर वह मानव नहीं रह जाता बल्कि ईश्वर तुत्य बन जाता है।
          इसके विपरीत केवल कमियाँ ही किसी मनुष्य में नहीं हो सकतीं। जिन्हें हम बुरा कहकर समाज से तिरस्कृत करते हैं उनमें भी कुछ-न-कुछ अच्छाइयाँ मिल ही जाती हैं। कोई भी मनुष्य जब अहंकार के कारण स्वयं को दूसरों से अधिक महान समझने लगता है तब वह सबकी नजर में बुरा बनने लगता है।
          हर मनुष्य स्वयं को दूसरों से अधिक समझदार समझता है। इसलिए वह दूसरों की प्रशंसा करने से परहेज करता है। दूसरों की मन से प्रशंसा करने के लिए बहुत बड़ा जिगर चाहिए। किसी की बुराई करने के लिए किसी हुनर की आवश्यकता नहीं होती। वह तो किसी भी समय, किसी की भी की जा सकती है।
        इसी कड़ी में हम यह भी कह सकते हैं कि जब तक हम दूसरे लोगों के लिए कुछ करते रहते हैं तब तक वे लापरवाह बने रहते हैं और कुछ नहीं करते। लेकिन जब इसके विपरीत आचरण हो जाए तो सब कहने लगते हैं कि आप तो पहले जैसे नहीं रहे, बिल्कुल बदल गए हैं।
          मनुष्य को सदा छिद्रान्वेषी अर्थात् दूसरों की बुराइयाँ ढूँढने वाला नहीं बनना चाहिए। हो सकता है कि जिसकी कमियाँ खोजकर उसका उपहास कर रहे हों, उससे भी अधिक दोष अपने अन्दर हों। एक अँगुली यदि दूसरे की ओर करो तो चार अँगुलियाँ अपनी ओर होती हैं।
        सन्त कबीरदास जी ने निम्न दोहे में इसी भाव को स्पष्ट करते हुए कहा है-
बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोय।
जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय।
अर्थात् कबीर जी कहते हैं कि मैं बुरे की खोज करने चला था, पर मुझे कोई भी बुरा व्यक्ति नहीं मिला। जब अपने अंतस को टटोला तब ज्ञात हुआ कि मुझसे बुरा कोई भी नहीं है।
        यह दोहा स्पष्ट कर रहा है कि अपनी बुराइयों को यदि मनुष्य खोजने लगे तो वह चौंक जाएगा कि उसके अंतस में इतनी कमियाँ है। तभी वह स्वयं को सुधारने का यत्न भी करेगा अन्यथा दूसरों को दोष देते, उनका उपहास करते नहीं थकता।
          परनिन्दा में सबका मन बहुत रमता है। इन्सान ऐसा कोई भी स्वर्णिम अवसर नहीं चूकता। इसके विपरीत अपनी अथवा अपनी बुराई की चर्चा वह सहन नहीं कर सकता। इसे वह अपने अहं का प्रश्न बना लेता है। अपने निन्दकों से किनारा करने में ही अपनी भलाई समझता है।
          इसी को ध्यान में रखते हुए कबीर दास जी कहते हैं-
निन्दक नियरे  राखिये आँगन  कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना निरमल करे सुभाय।
अर्थात् निन्दक को अपने बहुत पास रखना चाहिए यानी उसे अपने घर के आँगन में ही कुटिया या कमरा बनाकर देना चाहिए। वह सबसे बड़ा हितैषी होता है जो साबुन और पानी के बिना मनुष्य के स्वभाव को निर्मल बना देता है।
          भर्तृहरि जी 'नीर्तिशतकम्' में कहते हैं कि-
 परगुणपरमाणून्    पर्वतीकृत्य     नित्यम्।
निजहृदि विकसन्त: सन्ति सन्त: कियन्त:।।
अर्थात् दूसरों के परमाणु के समान छोटे से गुण को पर्वत के समान विशाल मानने वाले सज्जन लोग विरले ही मिलते हैं।
      कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरों के दोषों को बढ़ा-चढ़ाकर चटखारे लेने वाले लोगों की संख्या अधिक है। ऐसे लोग दूसरों की अच्छाइयों को अनदेखा कर देते हैं। परन्तु दूसरों के दोषों को अनदेखा करके उनके गुणों का बखान करना ही वास्तव में महानता कहलाती है।
        आत्मोन्नति चाहने वाले प्रत्येक मनुष्य को दूसरों की बुराई की ओर से आँख मूँद लेनी चाहिए और उनके गुणों की ओर ध्यान देना चाहिए। जहाँ तक हो सके मनुष्य को आत्मचिन्तन करते हुए अपनी बुराइयों या कमियों को दूर करके सद् गुणों का विकास करना चाहिए। 
दोष पराये देख कर चले हसन्त हसन्त
अपने याद न आवहि जिनको आदि न अन्त।
चन्द्र प्रभा सूद

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