पर्शियन समाज को नौरोज की शुभकामनाएं

22 मार्च 2021   |  शोभा भारद्वाज   (443 बार पढ़ा जा चुका है)

पर्शियन समाज को नौरोज की शुभकामनाएं

पर्शियन समाज को नौरोज की शुभकामनायें

डॉ शोभा भारद्वाज

पर्शियन संस्कृति में नव वर्ष (नौरोज) सोलर हिजरी कलंडर के अनुसार बहार (बसंत) का पहला दिन है .21 मार्च को नौरोज ईरान ,टर्की ,सीरिया इराक ,एवं खुर्द समाज में धूमधाम से मनाया जाता है ,पर्व में होली का उल्लास चैत्र मास के नवरात्रों ,बैसाखी एवं ईस्टर का आभास नजर आता है . मुगलकालीन बादशाह अकबर के युग में पर्शियन नौरोज का जश्न दरबार में धूमधाम से मनाया जाता था लेकिन बादशाह ओरंगजेब की धर्मान्धता हंसी ख़ुशी से मनाये जाने वाले उत्सव को बंद करा दिया .ईरान के मूल बाशिंदे ( पारसी समुदाय )के लोग अग्नि की पूजा करते थे यहाँ तीन प्रकार की पवित्र अग्नि मानी जाती है आज भी ईरान के ‘यज्द ‘ शहर में फायर टेम्पलेट है पर्शिया में 16वीं शताब्दी में ईरान के शाह ने इस्लाम कबूल कर लिया , वहाँ के मूल बाशिंदों जौराष्ट्रीयन पर धर्म परिवर्तन का दबाब पड़ने लगा अत :ज्यादातर जौराष्ट्रीयन ने अपना वतन छोड़ कर भारत की शरण ली वे सदा के लिए यहीं के हो गये, वह दूध में पानी की तरह घुल मिल गये हैं केवल 20%प्रतिशत पारसी ईरान में बच गये थे लेकिन इस्लामिक क्रांति के बाद वह फिर अपना वतन छोड़ने के लिए बाध्य हैं.

ईरान में सबसे ख़ुशी और धूमधाम से मनाया जाने वाला यह त्यौहार है .नौरोज का इतिहास 3000 वर्ष से अधिक पुराना है जब शाहे ईरान राजसी वस्त्र धारण कर शाही सिंहासन पर गेहू की मुट्ठी भर बालों ले कर दरबार में विराजमान होते थे उन्हें सबसे पहला दरबारी स्वर्ण पात्र में मदिरा ( सोमरस )देता था फिर उपहार में सोने के सिक्के ,एक सोने की अंगूठी , तलवार और धनुष पेश किया जाता था पूरा दरबार ईश्वर स्तुति कर उसकी असीम सत्ता का बखान करता बाद में शाह की प्रशंसा की जाती थी यह शाही दर्शन का दिन था नव वर्ष की खुशी में कैदियों को मुक्त कर दिया जाता .

समय बीतता गया आज भी नौरोज परम्परागत रूप से ही मनाया जाता है इस दिन की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती है पूरे घर को साफ कर उसे सजाया जाता है . हमारे यहाँ भी पारसी समाज रहता है वह भी धूम धाम से नौरोज के त्यौहार को मनाते हैं. प्राचीन ईरान में एक दिन पहले गोरूब ( शाम के ) के समय अग्नि जलाते थे उनके अनुसार नववर्ष से एक दिन पहले आग जलाना अंधकार पर विजय प्राप्त करना है ,शाम को शानदार वस्त्र पहन कर हाथो में रंग बिरंगे रूमाल ले कर उन्हें लहरा -लहरा कर आग के चारो तरफ रक्स (डांस )करते थे रजा शाह से समय में भी यह प्रथा चलती रही लेकिन इस्लामी सरकार आने के बाद इस प्रथा पर बैन लग गया है आग जलाना और रक्स करना धर्म के विरूद्ध माना जाता है फिर भी दूर किसी पहाड़ी पर नौरोज से पहले दिन शाम को आग जलती दिखायी देती थी वह आग पर से दूसरी तरफ कूद कर निकल जाते हैं .

ईरान में हर प्रकार का मौसम है गर्मी भी है और जम कर बर्फ भी पड्ती है अत :बहार के मौसम में कहीं -कहीं फसल पक जाती है ,वहाँ नई फसल की खुशी में , बर्फीले प्रदेश में बर्फ गिरने से पहले गोन्दुम ( गेहूं) बो दिया जाता है बीज बर्फ के नीचे दबा रहता है लेकिन बहार आते ही उनमें अंकुर फूट जाते हैं . पूरी घाटियां फूलों से भर जाती है जमीन पर मुख्यतया लाल फूल और उनके बीच में हर रंग के फूलों का गलीचा बिछ जाता प्रकति की अनुपम छटा मनमोहक होती है. घाटियों में चारो तरफ हरियाली ही हरियाली उनके बीच में झरने अद्भुत नजारा , पेड़ फूलों से लद जाते हैं फलदार पेंड़ो पर लगा हर फूल, फल है ऐसा लगता है जैसे प्रकृति नये वर्ष का स्वागत कर रही है .

नौरोज से दो हफ्ता पहले चीनी मिट्टी के खूबसूरत फूल पत्तियो की नक्काशीदार कटोरों में न गोन्दुम(गेहूं ) या जौ बोते हैं नौरोज के आते -आते इनमें हरी -हरी बालें उग आती है . यह पर्व सुबह से प्रारम्भ होता है हर घर के मेहमान खाने के बीचो बीच रक्खी मेज पर खूबसूरत मेज पोश बिछा कर सात वस्तुयें सजाई जाती हैं .अंकुरित कटोरे में उगी बालों को पौधों एवं वनस्पतियों का प्रतीक माना जाता है , एक फ्रेम दार शीशा आकाश का प्रतीक है , सीब (सेब) को धरती मानते हैं यह इंसानी जीवन एवं परिवार की वृद्धि की शुभ कामना का प्रतीक हैं . हरे कांच के पात्र में मोमबत्तियाँ सजाई जाती हैं यह अग्नि का प्रतीक है कांच के पात्र में गुलाब जल भर कर रखा जाता है पानी का प्रतीक हैं ,पतले कांच के पात्र में गोल्ड फिश रखते हैं यह पशुओं का प्रतीक है ,खूबसूरती से अंडे पेंट कर उन पर चित्र बनाये जाते हैं परिवार की वृद्धि की शुभ कामना है . जीवन के पांचो तत्व आकाश ,अग्नि वायू ,जल ,पृथ्वी सबको महत्व दिया जाता है .पूरे परिवार के लोग मेज के चारो तरफ खड़े होकर पवित्र पुस्तक कुरआन को सम्मान दे कर एक दूसरे के सुखद जीवन की दुआ मांगते हैं ,एवं एक दूसरे को नौरोजे शुमा मुबारक कहते हैं .घर का बुजुर्ग सब को उपहार देते हैं आज भी वहाँ सोने के सिक्के भेंट किये जाते हैं ,

ईरानी अपनी प्राचीन परम्परा को कभी नहीं भूले अत : सब्जे (अंकुरित गेहूं और जो की हरी हरी कोमल बालो की मिठाई ) ,जिसे पुनर्जन्म का प्रतीक माना जाता है बनाते हैं जबकि इस्लाम में पुनर्जन्म की धारणा नहीं है . गेहूं का मीठा दलिया जरुर बनता है. यहाँ हर वैराईटी का केक मिलता है विदेशी मेहमानों के लिए केक मंगाया जाता है त्यौहार में लोग एक दूसरे के घर भी मुबारक बाद देने जाते हैं घर आये मेहमानों का स्वागत सत्कार बड़े प्रेम से करते हैं . धनवान लोग विदेश भ्रमण के लिए भी जाते हैं .इस्लामी सरकार हिजाब की बेहद पाबन्द थी लेकिन समय के साथ कुछ बदलाव आया खानमों ने आगे की बालों की लट को रंगवा कर ऐसे हिजाब लिया बाहर झांकती लटें उनकी खूबसूरती में चार चाँद लगाती थीं .

नोरोज का तेरवां दिन सीसदा बदर कहलाता है हर परिवार घर से बाहर नदी के किनारे पिकनिक मनाने जाते हैं .घर से कटोरे में बोई हुई खेती को वह जल में प्रवाहित करते हैं कालीन बिछा कर बैठ जाते बेहतरीन खाना घर से पका कर लाते हैं जिसमे हरी सब्जी में पकी मछली ,आब गोश्त, हरी सब्जी और सफेद चने ड़ाल कर पकाया गोश्त ,ईरानी जाफरानी चावल लेकिन दलिया और अंकुरित बालों से बनी मिठाई जरूर बनती है , सूखे मेवे , फल और बहुत सी वस्तुये खाने में सजाई जाती हर मेहमान को बिफ़रमा (खाने के लिए आपका स्वागत हैं ) कह कर खाने का न्योता दिया जाता है . शाम को हंसी ख़ुशी घर लौटते हैं .

हमने दस नौरोज ईरान में मनाये हैं डाक्टर का जीवन बहुत व्यस्त होता है भारतीय , जिनमें सभी डाक्टर आंध्रा के थे हम अकेले उत्तर भारतीय थे पाकिस्तानी एवं बंगलादेश के डाक्टर ईरानी डाक्टर की जगह ड्यूटी देते थे . नौरोज की कई छुट्टियां होती थी .एमरजेंसी ड्यूटी के बाद पाकिस्तानी डाक्टर हमारे घर मेहमान थे . मैं खाने की पहले ही तैयारी कर लेती .उनमें डाक्टर नसीर अख्तर ,मेरे बच्चे उनका ख़ास इंतजार करते जैसे ही वह दिखाई देते दरवाजा घेर लेते बच्चे आँखें मटका कर इशारे से पूछते केक वह उँगलियों के इशारे से बताते भूल गया बच्चे कांच का दरवाजा बंद कर देते अब नसीर भाई उन्हें छुपाया केक का डब्बा दिखाते केक का डिब्बा उनके हाथ से झपट कर घर के बाहर के बाग़ की दीवार पर खोल कर खाना शुरू उन्हें पता था अंकल उनकी पसंद का चाकलेट केक लायें हैं नसीर भाई के बच्चे रावलपिंडी में रहते थे वह बच्चों की शैतानियों का भरपूर आनन्द लेते .वह इन शैतानों को थ्री डैवल कह कर बुलाते . दोपहर दो बजे ईरान टेलीविजन पर रंगारंग प्रोग्राम आते हैं बच्चे घड़ी में समय देखते रहते थे जैसे ही एंकर आती वह कहती ” नौरोजे शुमा मुबारक ” बच्चे भी दुगनी आवाज से चीखते नौरोजे शुमा मुबारक -मुबारक फिर वह कहती ”ईदे (फ़ारसी में इसका अर्थ खुशी है ) शुमा मुबारक ” बच्चे भी उसी लहजे में खानम जान मुबारक मुबारक “‘ उनका मानना था जितनी खुशी से नया दिन मनाया जायेगा पूरा वर्ष उतना ही अच्छा गुजरेगा पूरे तेरह दिन जश्न के दिन थे बड़ी हंसी ख़ुशी से दिन गुजरता था .

सीसदा बदर के दिन हम भी अपना बेहतरीन हिंदी खाना जिसमें खीर गाजर का हलवा लड्डू कचौरी सब्जी अन्य पकवान बनाते हमारे घर के पास से रूद खाना पहाड़ी नदी बहती थी हम भी अपना सिफरा बिछा कर खाना सजा लेते बहुत से ईरानी जाने, अनजाने लोग हमारे साथ हमारा और अपना भोजन बाँट कर खाते थे हंसी ख़ुशी से समय निकल जता था .हमारे यहाँ का पारसी समाज अपने से अलग नहीं लगता इसमें अनेक महापुरुषों ने भारत में जन्म लिया और इतिहास के पन्नों में अमर हो गये

पर्शियन समाज को नौरोज की शुभकामनाएं

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