चांद के पार चलो।

22 मार्च 2021   |  शिल्पा रोंघे   (425 बार पढ़ा जा चुका है)

 चांद के पार चलो।

आज नवीन की पेटिंग ने एक मशहूर कॉम्पीटिशन में पहला स्थान पाया था, आज मेल बॉक्स खोलकर देखा तो वो हैरान हो गया ऐसी तो किसी कॉम्पीटिशन में उसने भाग ही नहीं लिया था, तो फिर ऐसा कैसा हुआ। तभी उसने वहां फोन लगाया तो मालूम हुआ कि चांद की तस्वीर तो शिखा बना रही थी, अच्छा तो इसलिए उसने पेटिंग को छिपाया।

पता नहीं लेकिन इस बात ने उसके स्वाभिमान को अंजाने में ही ठेस पहुंचा दी, वो तो कई बार उस कॉम्पीटिशन में भाग ले चुका है लेकिन बस कुछ ही अंक से वो पीछे छूट जाता है।

उसे अपनी मेहनत पर यकीन था, किसी का हाथ पकड़कर आगे बढ़ना उसे बिल्कुल गंवारा नहीं था, एक ना एक दिन उसे उसकी मंजिल मिल जाएगी ऐसा उसे यकीन था। खुश होने की बजाए आज नाराजगी ने उसके मन में जगह बना ली।

उसने शिखा को तुंरत फोन लगाया कहा “धन्यवाद मुझ पर अहसान करने के लिए और मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए तुम जीत गई।”

शिखा ने कहा “मैं चाहती थी तुमको अपनी ज़िंदगी में जल्दी ही सफलता मिल जाए तुमको मेहनत करते देखकर मुझे बुरा लगता है, रात-रात जागकर काम करते हो तुम लेकिन फिर भी हर बार कुछ ना कुछ कारण से बात बन नहीं पाती।”

“मैं तुमसे मिलना चाहता हूं।” नवीन ने कहा।

कुछ दी देर बाद वो शिखा से मिलने कॉफी शॉप पहुंचा और बोला जितना भी इनाम मुझे मिला है उसकी राशी तुम ही रखो, ये बात अलग है कि अब उस पे़टिंग और कामयाबी से मेरा नाम जुड़ चुका है जिसे अब मैं चाहकर भी वापस नहीं ले सकता हूं शुक्रिया तुम्हारे बिन मांगे अहसान के लिए।

कॉफी पीने तक जैसे-तैसे नवीन ने खुद को संभाले रखा।

अभी तक शिखा ने नवीन के लिए अपने दिल की भावना व्यक्त नहीं की थी, नवीन भी अपनी ही दुनिया में रहता अपने करियर के आगे कुछ नहीं दिखाई देता था उसे, बस एक सॉफ्ट कार्नर था उसके मन में शिखा के लिए जिसे वो कबूल नहीं करता था शिखा भी सोचती क्या पता वो कैसा महसूस करेगा, अगर वो अपने दिल की बात उसे कह देगी तो कहीं वो उससे मुंह ना मोड़ ले।

नवीन की क्लॉसमेट थी शिखा, दोनों ही एक ही कॉलेज में पढ़े थे।

नवीन ने अपनी पेटिंग शॉप खोल ली, तो वहीं शिखा छोटे बच्चों को पेटिंग सिखाने लगी।

इससे पहले शिखा उसे कुछ समझा पाती वह उठकर वहां से चला गया।

तभी शिखा ने अपनी दोस्त नमिता को कॉल लगाकर पूरा किस्सा सुनाया।

नमिता ने कहा मुझे मालूम है कि तुम्हारें हाथों की उंगलियां किस कदर कांपती है पेटिंग बनाते वक्त, फिर भी तुमने कई दिन और रात लगा दिए उस पेटिंग को बनाने में जिसका क्रेडिट तुमको मिलना ही नहीं था, और बदले में तुम्हें सिर्फ शिकायत ही मिली। पुरुष मन को समझ पाना बहुत कठिन होता है कौन सी बात उन्हें खल जाए ये कह पाना बहुत ही कठिन होता है। खैर तुम्हारें इरादे नेक ही थे लेकिन अब क्या कर सकते है भला ?बेहतर होगा कि तुम अपना ध्यान अपनी तरक्की में लगाओं ना कि किसी और का जीवन बनाने में, तुम्हें अपनी आर्ट गैलरी खोलनी है ना, भूल गई क्या ?

पांच साल पहले कही गई नमिता की बात अचानक ही शिखा के जहन में जिंदा हो गई। उसने सोचा भी नहीं था कि वो अपनी आर्ट गैलरी का सपना पूरा कर लेगी। जैसे-तैसे पैसे जुटा के उसने ये काम किया कितना संघर्ष करना पड़ा उसे, कभी खुद की बचत लगानी पड़ी तो कभी मां के गहने बेचने पड़े लेकिन असंभव सा लगने वाला ये काम उसने कर ही लिया।

नवीन उससे पहले ही मशहूर हो चुका था शिखा की बनाई हुई पेटिंग के बदलौत, लेकिन शिखा ने जब आर्ट गैलरी का उद्घाटन किया, तो शहर के नामचीन लोग थे वहां पर लेकिन नवीन नहीं आया।

आज शिखा को लगा कि शायद अंजाने में ही उसके नवीन की बेहतरी के लिए उठाए गए कदम ने उसे नवीन से दूर कर दिया और अपने लक्ष्य के पास ला दिया । सच ही तो कहा नमिता ने पहले हमें अपने आप को खुश करना सीखना चाहिए बाकी चीज़ों का भरोसा तो कोई नहीं दिला सकता है।

तभी अचानक नमिता का कॉल आया वो बोली “मेरी तबीयत आज थोड़ी खराब थी तो मैं आ नहीं सकी किसी और दिन मिलने आउंगी। वैसे क्या नाम रखा है तुमने अपनी गैलरी का”

शिखा ने कहा “चांद के पार चलो।’’

ये वही नाम था जो उसने नवीन के लिए बनाई पेटिंग के लिए रखा था।

उसके अहसासों का चांद तक पहुंच पाना संभव नहीं था, लेकिन रंगों ने तो चांदनी बिखेर ही दी थी। जिसकी चमक ही काफी थी उसके एकांत भरे जीवन में रंग भरने के लिए। जो काली रात में झिलमिल सितारों की तरह उसके जीवन को रोशन कर रहे थे। अब रंग ही उसकी साधना थे और जीने की राह भी।

सचमुच औरत होना ही अपने आप में पूरा है फिर भी ना जाने क्यों दुनिया उसे उसके पिता तो कभी पति के नाम से ही जानना चाहती है इस तरह के सवाल उसे परेशान नहीं करते थे।

शिल्पा रोंघे

© सर्वाधिकार सुरक्षित, कहानी के सभी पात्र काल्पनिक है जिसका जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है।


koshishmerikalamki.blogspot.com

 चांद के पार चलो।

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