होलिका दहन का उद्देश्य

28 मार्च 2021   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (427 बार पढ़ा जा चुका है)

होलिका दहन का उद्देश्य

*हमारे देश भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक त्यौहार है होली | होली वस्तुतः दो दिनों का पर्व है प्रथम दिन होलिका दहन का होता है दूसरा दिन रंगोत्सव का | होलिका दहन का पर्व बड़ी ही उल्लास के साथ हमारे देश में मनाया जाता है | सनातन धर्म के प्रत्येक पर्व एवं त्यौहार नकारात्मकता का त्याग करके जीवन में सकारात्मकता का प्रवेश कराते हैं | यह सनातन की दिव्यता है कि प्रत्येक पर्व के माध्यम से कोई न कोई संदेश आम जनमानस के बीच में पहुंचता रहता है | समय-समय पर आने वाले सनातन धर्म के त्यौहारों के माध्यम से मनुष्य कुछ पल के लिए ही सही परंतु अपनी पुरातन संस्कृति के विषय में जानने को उत्सुक होता रहा है | होलिका दहन एक ऐसा पर्व है जो बुराई पर अच्छाई की जीत का जीता जागता उदाहरण है | पूर्व काल हिरणाकश्यप नाम का एक दुर्दांत निशाचर हुआ उसके यहां प्रहलाद के रूप में एक भक्त ने जन्म लिया | यद्यपि हिरणाकश्यप भगवान श्री हरि विष्णु से बैर मानता था परंतु उसी के पुत्र प्रहलाद भगवान के परम भक्त थे | हिरणाकश्यप ने बहुत प्रयास किया कि प्रहलाद भगवान का नाम लेना बंद कर दे परंतु प्रहलाद नहीं माने | अंततोगत्वा असुरराज की बहन होलिका ने भक्त प्रहलाद को जला देने की व्यवस्था बनाई | होलिका को भगवान शिव से एक ऐसी चादर प्राप्त हुई थी जिस पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था | लकड़ी के ढेर पर प्रहलाद को लेकर होलिका इस चालाकी से बैठ गई कि स्वयं चादर ओढ़ लेगी और प्रहलाद जल जाएगा परंतु ईश्वर सदैव सकारात्मक लोगों का साथ देता है नियत समय पर हवा का एक झोंका आया और होलिका के शरीर की चादर उड़कर प्रहलाद के शरीर पर पड़ गई और प्रहलाद उस विशाल अग्नि सागर से सुरक्षित बाहर निकल आए और होलिका उसी में जल गई | होलिका को जला हुआ देखकर भगवान के भक्तों ने प्रसन्नता से भगवान की जय जय कार की और पहलाद को गले से लगा लिया | तब से लेकर आज तक होलिका दहन की परंपरा हमारे भारत देश में मनाई जाती रही है | होलिका दहन करने का तात्पर्य है कि हम अपने जीवन की बुराइयों का दहन होलिका की अग्नि में करेंगे ऐसे संकल्प के साथ होलिका दहन करना चाहिए |*


*आज गांव से लेकर शहर तक प्रत्येक चौराहे पर लकड़ियों का समूह लगाकर उसे जला देना ही होलिका दहन माना जाने लगा है | होलिका दहन के मूल उद्देश को हम भूलते चले जा रहे हैं | आज लकड़ियों का ढेर लगा कर उसकी पूजा करके उसे जला देना ही होलिका दहन माना जा रहा है जबकि होलिका दहन का मूल उद्देश्य अपने अंदर व्याप्त बुराइयों का दहन करना माना गया है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि होलिका दहन करने जाते समय प्रत्येक मनुष्य को अपने स्वयं की , परिवार की एवं समाज की बुराइयों का दहन उसी होलिका की अग्नि में करने का प्रयास करना चाहिए | जब हम अपनी बुराइयों का त्याग अर्थात दहन होलिका के अग्नि के समक्ष करते हैं तो हमारा शरीर भी प्रहलाद की तरह कुंदन होकर के चमकने लगता है परंतु आज सब कुछ मात्र दिखाने के लिए किया जा रहा है | आज मनुष्य अपने मूल उद्देश्य को भूल गया है इतना जरूर है कि इन परंपराओं को जीवित रखा गया है | आधुनिकता ने भले ही इसके मूल स्वभाव को परिवर्तित कर दिया हूं परंतु संतोष यही इतना है कि आज भी हमारे सनातन संस्कृति पुरातन मान्यताएं इन त्योहारों के माध्यम से समाज में जीवित हैं परंतु होलिका दहन करने का वास्तविक आनंद तभी मिल सकता है जब होलिका राक्षसी रूपी बुराई को जला कर के प्रहलाद रूपी भक्तों को उस अग्नि से निकाला जाए | ऐसा करने का प्रयास प्रत्येक मनुष्य को अवश्य करना चाहिए |*


*होलिका दहन करने के बाद उसी होलिका की अग्नि नवान्न की आहुति देकर नवान्न भक्षण करने की भी परंपरा हमारे देश में मनाई जाती रही है |*

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