हमारे लोकगीत :- आचार्य अर्जुन तिवारी

31 मार्च 2021   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (423 बार पढ़ा जा चुका है)

हमारे लोकगीत :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारे देश भारत की संस्कृति आदिकाल से ही समृद्धशाली रही है | समय-समय पर पड़ने वाले अनेक पर्व एवं त्योहार हमारी संस्कृति का दर्शन कराते रहे हैं | इन त्योहारों के समय गाए जाने वाले लोकगीत हमारे त्योहारों की भव्यता को और भी बढ़ा देते थे | सावन के महीने में गाय जाने वाले कजरी गीत एवं झूला गीत तथा फागुन के महीने में फगुआ , डेड़ताल , चौताल तथा होली गीत में हमारी संस्कृति के दर्शन होते थे | बसंत पंचमी के दिन से लेकर चैत्र कृष्ण की अष्टमी (होलाष्टक) तक गांव में दरवाजे - दरवाजे पर फगुआ तथा होली गीत का आयोजन हुआ करता था | लोग बड़े प्रेम से इन आयोजनों में सम्मिलित होते थे जिसके माध्यम से हमारी संस्कृति की भव्यता का दर्शन हुआ करता था | भारत विभिन्न संस्कृतियों का देश है यहां प्रत्येक प्रदेश में बोली - भाषा में भले ही भिन्न हो परंतु इन त्योहारों के अवसर पर गाए जाने वाले आंचलिक गीतों का इनका उद्देश्य एक ही होता था | यदि इन लोकगीतों का भाव देखा जाय तो इसमें मनोरंजन का साधन तो होता ही था साथ ही अपने देश , समाज एवं अपने धर्म का वर्णन भी होता था | भगवान श्री कृष्ण एवं भगवान राम के साथ-साथ किसी बिरही स्त्री की दशा का वर्णन इन गीतों के माध्यम से बड़े ही मनोहारी ढंग से प्रस्तुत किया जाता था जिसे सुनकर लोग भाव विभोर हो जाया करते थे | ऐसा इसलिए होता था क्योंकि पूर्वकाल में लोग इन आयोजनों को एक दूसरे से जुड़ने तथा मिलने का माध्यम समझते थे और यह आयोजन एक दूसरों को जोड़ने का सशक्त माध्यम हुआ भी करता था परंतु अब समाज की दिशा एवं दशा परिवर्तित हो गई है | आज के आधुनिक युग में सब कुछ बदला-बदला सा दिखाई पड़ रहा है | ढोलक की थाप , मजीरे की झंकार के साथ मिलकर गाए जाने वाले लोकगीत अब लुप्त होते जा रहे हैं क्योंकि आज की युवा पीढ़ी इन आयोजनों ने रुचि नहीं ले रही है यह चिंतनीय एवं विचारणीय विषय है |*


*आज पूरा त्यौहार बीत जाता है कहीं भी ना तो कजरी गीत सुनने को मिलते हैं और ना ही होली गीत | आज की युवा पीढ़ी अपने मोबाइल में व्यस्त रह कर इन आयोजनों से विमुख हो रही है | गांव में कुछ लोग जो इन लोकगीतों के जानकार भी हैं वह भी समाज को देखते हुए इससे विमुख हो रहे हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह देखकर विचार करता हूं कि आज हमारे लोकगीतों की दुर्दशा का कारण आखिर कौन है ? कुछ लोग इसका कारण आधुनिकता को मानते हैं परंतु मेरा विचार है कि इसका कारण आधुनिकता नहीं बल्कि हम स्वयं हैं | हमने अपने पूर्वजों की परंपरा को सहेजने की कोशिश नहीं की | लोकगीत देखने में तो बड़े साधारण लगते परंतु यदि इनको ढंग से प्रस्तुत किया जाए तो यह बहुत ही सशक्त एवं हृदय को झकझोर देने वाले होते हैं | आज लोग डीजे की धुन पर नंगा नाच करना तो पसंद करते हैं परंतु अपनी संस्कृति का प्रसार करने वाले इन लोकगीतों से विमुख हो गए हैं क्योंकि आज की युवा पीढ़ी ने लोकगीतों को ना तो सुनने का प्रयास किया और ना ही सीखने का | होली के पावन अवसर पर गाया जाने वाला फगुआ एवं होली गीत समाज को जोड़ने का काम करते रहे हैं | समाज के प्रत्येक वर्ग के लोग एक साथ बैठकर इन आयोजनों में सम्मिलित होते रहे हैं जिसमें आपसी भेदभाव नहीं रह जाता था परंतु आज समाज की जो स्थिति है उसमें कुछ लोग इन आयोजनों में बैठने से इसलिए कतराते हैं कि कहीं वह छोटे ना हो जायं | ऐसे आयोजनों में जब लोग एक साथ बैठते हैं तो लोकगीत तो गाये ही जाते हैं साथ में लोग एक दूसरे से हंसी मजाक या चूहलबाजी करके अपने मन के मैल को भी डालते हैं | आज ऐसे आयोजनों की आवश्यकता है जिससे कि समाज आपस में जुड़ सके | युवा पीढ़ी को इसमें आगे आने की आवश्यकता है जिससे कि हमारी लेक संस्कृति का प्रसार होता रहे |*


*लोक भाषा में गाए जाने वाले लोकगीत हमारे हृदय की संवेदना का सशक्त माध्यम हैं जो हृदय के मैल को निकाल कर बाहर रख देते हैं | ऐसे आयोजन सदैव होते रहने चाहिए |*

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