सुशीलो मातृपुण्येन :- आचार्य अर्जुन तिवारी

31 मार्च 2021   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (407 बार पढ़ा जा चुका है)

सुशीलो  मातृपुण्येन :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य अनेक प्रकार के क्रियाकलाप करता रहता है , अपने क्रियाकलाप एवं कर्मों के आधार पर मनुष्य को यहां सम्मान एवं अपमान प्राप्त होता है | कोई भी संतान संस्कारी तभी हो सकती है जब उसके माता-पिता में भी संस्कार हो | सबसे बड़ा संस्कार है सुशील होना | संतान सुशील तभी हो सकती है जब उसकी माता में यह गुण हो | परिवार के संस्कार लेकर ही बालक समाज में उतरता है | यदि परिवार संस्कारी नहीं है तो बालक में भी संस्कार नहीं आ सकते | भगवान राम , वीर शिवाजी , भक्त पहलाद ऐसे अनेकों उदाहरण है जो हमें यह शिक्षा देते हैं कि माता के ही संस्कार बालक में परिलक्षित होते हैं | हमारे शास्त्रों में लिखा है :- सुशीलो मातृपुण्येन, पितृपुण्येन चातुरः । औदार्यं वंशपुण्येन, आत्मपुण्येन भाग्यवान ।। अर्थात :- कोई भी मनुष्य अपनी माता के पुण्य से सुशील होता है, पिता के पुण्य से चतुर होता है, वंश के पुण्य से उदार होता है और अपने स्वयं के पुण्य होते हैं तभी वह भाग्यवान होता है। अतः सौभाग्य प्राप्ति के लिए सत्कर्म करते रहना आवश्यक है | मनुष्य सत्कर्म तभी कर पाता है जब परिवार में उसे सत्कर्म करने की शिक्षा मिलती है जब परिवार में ही संस्कार नहीं है तो बालक में भी संस्कार नहीं आ सकते इसलिए इतिहास से शिक्षा लेते हुए प्रत्येक मनुष्य को संस्कार एवं सत्कर्म का पालन करते हुए अपने बालक को सत्कर्मी एवं संस्कारी बनाने का प्रयास करते रहना चाहिए क्योंकि बालक जब अच्छे संस्कार लेकर समाज में जाता है तब वह अपने परिवार समाज एवं देश का नाम उज्जवल करता है अन्यथा कर्म हीन मनुष्य कुसंस्कारी बन करके स्थान स्थान पर अपमानित तो होता रहता है साथ ही उसका जीवन दुष्कर्म से प्रभावित होकर समाज एवं देश से उपेक्षित हो जाता है |*


*आज समाज में संस्कारों का लोप स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है | आज की संताने किसी को आदर सम्मान नहीं देना चाहती | आज यदि बालक में संस्कार देखने को नहीं मिल रहे हैं तो उसका प्रमुख कारण यह है कि आज माता-पिता उस बालक में संस्कार का आरोपण नहीं कर पा रहे हैं | जो स्वयं अपने संस्कार भूल गया हो वह अपने बालक में संस्कार कैसे आरोपित कर सकता है | कुछ लोग यह भी कर सकते हैं प्रहलाद हिरणाकश्यप जैसे दुर्दांत निशाचर का पुत्र था तो उसमें संस्कार कहां से आ गए पुलस्त्य ऋषि के उज्जवल वंश में जन्म लेकर रावण दुष्कर्मी कैसे हो गया ? ऐसे सभी लोगों को मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बता देना चाहता हूं कि प्रहलाद की माता कुसंस्कारी नहीं थी | पिता भले ही दुर्दांत निशाचर था परंतु प्रहलाद की माता संस्कारवान थी , वहीं दूसरी ओर रावण भले ही महर्षि विश्रवा का पुत्र था परंतु उसकी माता केकेसी में राक्षसी प्रवृत्तियां थी और संस्कार बिल्कुल नहीं थी इसलिए रावण कुख्यात निशाचर हुआ | कहने का तात्पर्य यह है कि बालक के ऊपर सर्वप्रथम माता के संस्कारों का प्रभाव पड़ता है | यदि मां चाहे तो अपने बालक को राम और कृष्ण बना सकती हैं और यदि चाहे तो रावण और कंस तैयार कर सकती है | आज आवश्यकता है कि माताएं अपने बालक में संस्कारों का आरोपण करें जिससे कि बालक समाज में प्रतिष्ठित एवं सम्मानित हो सके | माता के दिये संस्कार बालक के मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ते हैं जिनका पालन वह जीवन भर करता है | अतः बालक को संस्कारी बनाने में माता का दायित्व सबसे बड़ा हो जाता है | आज माताएं अपने बालक पर ध्यान नहीं दे पा रही हैं उन्हें जन्म देकर सेविकाओं के भरोसे छोड़कर अपना नित्य कार्य संपन्न कर रही हैं यही कारण है कि बालक में माता के संस्कार नहीं आ पा रहे हैं इसमें सुधार करने की आवश्यकता है |*


*एक संस्कारी बालक अपनी सात पीढ़ियों को सम्मानित करवा सकता है वही कर्म हीन होकर अपने पूर्वजों को अपमानित करने का कार्य संस्कार से विहीम मनुष्य करते रहते हैं इसलिए जीवन में संस्कार का होना परम आवश्यक है |*

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