फटी जींस फैशन या बाजारवाद की देन

31 मार्च 2021   |  शोभा भारद्वाज   (443 बार पढ़ा जा चुका है)

फटी जींस फैशन या बाजारवाद की देन

फटी जींस फैशन या बाजारवाद की देन

डॉ शोभा भारद्वाज

मेरा लड़का बड़ी पोस्ट पर समझ लीजिये बॉस था रोज फार्मल पहनता था शुक्र वार को पहनने के लिए इकलोती जींस थी रगड़- रगड़ कर धोने से रंग भी उड़ गया घिस भी गयी इसके अंडर में काम करने वाली लड़कियों में चर्चा चली सर की जींस बहुत सैक्सी हैं उसके सहायक ने कहा अरे कहा शुक्रवार से इतवार तक सर इसे पहने रहते हैं आंटी रगड़ – रगड़ कर धोती है यह नेचुरल है एक दिन घुटने नजर आने लगेंगे तब बॉस को शर्म आई और नई जींस खरीदी लेकिन उसकी पुरानी घिसी फटी जींस के कई कद्रदान थे .वह जींस को आफिस ले गया जिसके नाम की चिट निकाली उसने अपने आप को भाग्यवान समझा .

भाषण के दौरान मुख्यमंत्री रावत ने कहा था कि संस्कारों के अभाव में युवा अजीबोगरीब फैशन करने लगे हैं और घुटनों पर फटी जींस पहनकर खुद को बडे़ बाप का बेटा समझते हैं. ऐसे फैशन में लड़कियां भी पीछे नहीं हैं. उन्हें लड़के क्या पहनते हैं इस पर एतराज कम था लड़कियों का फटी जींस पहन कर निकलना अच्छा नहीं लगा कपड़े पहनना कैसे कपड़े पहनना लड़कों एवं लड़कियों का अधिकार है जहाँ सब एक जैसे कपड़े पहनते हैं किसी का ध्यान उनकी तरफ नहीं जाता . सिंगापुर में सैर करने का बहुत शौक है सभी अपने आपको फिट रखने के लिए लम्बी सैर करने जाते हैं यहाँ के मौसम में उमस बहुत है लड़कियां भी बहुत छोटे कपड़े पहनती हैं मैने वहाँ मोटी या ओवर वेट लड़कियाँ नहीं देखी उनपर सभी तरह का पहनावा जचता है . भारत के महानगरों में हर तरह के कपड़े पहने जाते हैं ज्यादातर बड़े घरों की लड़कियां कारों में आती जाती है आम आदमी की उनपर नजर नहीं पड़ती लेकिन इन कपड़ों में सड़कों पर घूमती लड़कियां दिखाई दी उनको घूरती आँखें साफ़ देखी जा सकती हैं .

पहली जींस 1870 में मोटे कपड़ें की मजबूत और टिकाऊ जींस फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों के लिए लोब स्ट्रास ने डिजाइन की थी मजदूरों के लिए सुविधाजनक रोज धोने की भी जरूरत नहीं थी नीली जींस पहने मजदूर दूर से पहचान में आ जाते थे, रंग धीरे – धीरे फेंट होता तब भी अच्छी लगती थी लम्बे समय तक चलती थी . जींस लेवाइस कंपनी के रूप में पूरी दुनिया में छा गई. स्टूडेंट्स ने जींस को खुश होकर अपना लिया रोज धोने का झंझट नहीं था इसके ऊपर किसी भी तरह का टौप पहन लो फैशन के साथ सुविधा जनक् भी है ख़ास मौकों पर फार्मल पहन लो .

डेनिम के कपड़े की खासियत यह है शुद्ध काटन की होती हैं गर्मियों में गर्मी और पसीने से बचा जा सकता है और तीखी सर्दी में गर्माहट देता है. 1970 से पहले तक वही लोग फटी जींस पहनते थे जो नई जींस नहीं खरीद पाते थे. उस जमाने में फटी जींस गरीबी की निशानी थी.
1970 से अपने आप को रफ टफ दिखाने के लिए पॉप कल्चर के चलते बहुत से रॉकस्टार जैसे बीटल्स, आदि ने फटी जींस को पूरी दुनिया में मशहूर कर दिया. अपने गानों के जरिए समाज के प्रति अपनी नाराजगी दिखाने में फटी हुई जींस उनकी पहचान बन गयी . फिल्म की मशहूर हस्तियों ने मीडिया में सुर्खियाँ बटोरने अपने आप को गरीब , गरीबों का साथी दिखाने के लिए अपने आप को मशहूर किया जबकि एक फिल्म में उनका रेट करोड़ों में है उनके चाहने वालों की कमी नहीं थी इसे फैशन समझ कर लड़के लड़कियों ने अपना लिया . फटी जींस जिनमें छेद किये जाते थे अब बाजरों में बिकने लगीं इनमें सस्ती जींस के कपड़े का प्रयोग किया जाने लगा .
महंगे ब्रांड की जींस में वर्कर अपने हाथों से कट का डिजाइन और छेद तय करते हैं. सबसे पहले डिजाइन को जींस पर पेन या चॉक से बनाया जाता है. फिर काटा जाता है और आखिर में एक ट्वीजर जैसे यंत्र से इसे फिनिशिंग दी जाती है.अगर आप भी फटी जींस पहनने के शौकीन हैं हर तरह के छेद कर सकते हैं जैसे घुटने से फटी जींस पैबंद लगी बहुत प्रचलित हैं कुछ पर पायंचा बचा कर आड़े कट लगाये जाते हैं टांगों की नुमाईश होती है लड़के निकर लड़किया मिनी स्कर्ट पहने सकते है मजबूरी गरीबी का इजहार भरे पेट वालों का फैशन बन गया है .

मुझे याद आई ब्रिटिश गुलामी की गरीबी . देश से कपास सस्ते दामों पर ब्रिटेन जाता मशीनों पर तैयार कपड़ा देश में आता ,महंगे दाम खरीदना सबके बस की बात नहीं थी .बिहार के चम्पारन में महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह का नेतृत्व किया किसानों को नील की खेती के लिए विवश किया जाता था लेकिन मूल्य अंग्रेज तय करते थे जन आन्दोलन में पुरुषों ने भाग लिया महिलाएं नजर नहीं आई बापू ने कस्तूरबा को महिलाओं से मिलने भेजा एक द्वार खटखटाया भद्र महिला ने दरवाजा खोला कस्तूरबा ने पूछा क्या आप हमसे नाराज हैं हम चाहते हैं आन्दोलन में सबका साथ मिले महिला के उत्तर हम आपका बहुत सम्मान करते हैं लेकिन हमारे पास एक ही धोती है बाकी महिलाएं चीथड़े पहने हैं जो भी महिला बाहर जाती है वह इस धोती को पहन लेती है सोने के लिए जमीन पर पुआल बिछा है अध् भूखे पेट जाड़े की रात ठिठुरते कटती हैं बस किसी तरह ज़िंदा हैं बा की आँखों से आंसू बहने लगे उन्होंने गांधी जी को बताया तब गांधी जी ने चरखे का महत्व समझाया अपनी रुई को कात कर सूत बनायें अपने गावँ का जुलाहा खड्डी पर सूत से धोती बना देगें .विदेशी कपड़ों का बहिष्कार असहयोग आन्दोलन का हिस्सा बना था .

आजादी के बाद भी इतनी गरीबी थी महिलाओं के पास एक धोती थी उसी में नहा कर बदन पर सुखा लेती थी ब्लाउज भी कम को नसीब होता था .नायलोन का आविष्कार हुआ लोगों को सस्ता कपड़ा पहनने को मिला .

फटी जींस के नाम पर हम गरीबी का सुख भोगते हैं . कार से उतरना लेकिन गरीब दिखना .जींस का कपड़ा मजबूत होता एक जींस सालों चलती है घिसने , फेंट होने के बाद भी अच्छी लगती है अत: कोशिश की गयी कटी फटी जींस झांकते घुटने टांगों का प्रदर्शन इसके ब्रांड एम्बेसडर सिनेमा , टीवी आर्टिस्ट बन गये फटी जींस उधड़ी हुई स्थान –स्थान पर कट कितने दिन चल सकेंगी जींस का बाजार बढ़ेगा क्या करें सब कुछ बेच लिया अब नई फटी जींस बेच लें .

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