शीतलाष्टकम्

31 मार्च 2021   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (420 बार पढ़ा जा चुका है)

शीतलाष्टकम्

शीतलाष्टकम्

अभी दो दिन पूर्व रायपुर छत्तीसगढ़ में थे तो एक स्थान पर शीतला माता का मन्दिर देखा | ध्यान आया कि श्वसुरालय ऋषिकेश और पैतृक नगर नजीबाबाद में इसी प्रकार के शीतला माता के मन्दिर हैं | और तब स्मरण हो आया अपने बचपन का – जब होली के बाद आने वाली शीतलाष्टमी को शीतला माता के मन्दिर पर मेला भरा करता था जो बड़ों के लिए एक ओर जहाँ शीतला माता की पूजा अर्चना का स्थान होता था वहीं हम बच्चों के लिए मनोरंजन का माध्यम होता था |

चैत्र कृष्ण सप्तमी और अष्टमी को उत्तर भारत में शीतला माता की पूजा की जाती है | कुछ स्थानों पर यह पूजा सप्तमी को होती है और कुछ स्थानों पर अष्टमी को | वैसे शीतला देवी की पूजा अलग अलग स्थानों पर अलग अलग समय की जाती है | कहीं माघ शुक्ल षष्ठी को इसका आयोजन होता है तो कहीं वैशाख कृष्ण अष्टमी को तो कहीं चैत्र कृष्ण सप्तमी-अष्टमी को | कुछ स्थानों पर होली के बाद प्रथम सोमवार अथवा बुधवार को शीतला माता की पूजा का विधान है | किन्तु चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी को शीतला पूजा का विशेष महत्त्व है | इस वर्ष शनिवार तीन अप्रैल को प्रातः छह बजे के लगभग विष्टि करण (भद्रा) और वरीयान योग में सप्तमी तिथि का आगमन हो रहा है | सूर्योदय तीन अप्रैल को प्रातः छह बजकर नौ मिनट पर हो रहा है | अतः सूर्योदय के बाद किसी भी समय शीतला सप्तमी की पूजा की जा सकती है | जो लोग अष्टमी को शीतला देवी की पूजा करते हैं उनके लिए चार अप्रैल को सूर्योदय से पूर्व चार बजकर चौदह मिनट के लगभग अष्टमी तिथि का आगमन होगा जो अर्द्धरात्र्योत्तर 2:59 तक रहेगी | उस दिन भगवान भास्कर छह बजकर सात मिनट पर उदित होंगे | अतः सूर्योदय के बाद किसी भी समय शीतलाष्टमी की पूजा की जा सकती है |

शीतला माता का उल्लेख स्कन्द पुराण में उपलब्ध होता है | इसके लिए पहले दिन सायंकाल के समय भोजन बनाकर रख दिया जाता है और अगले दिन उस बासी भोजन का ही देवी को भोग लगाया जाता है और उसी को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है | इसका कारण सम्भवतः यही रहा होगा कि इसके बाद ऐसा मौसम आ जाता है जब भोजन बासी बचने पर खराब हो जाता है और उसे फिर से उपयोग में नहीं लाया जा सकता | और इसी कारण से कुछ स्थानों पर इसे “बासडा” अथवा “बसौड़ा” भी कहा जाता है | इस दिन लोग लाल वस्त्र, कुमकुम, दही, गंगाजल, कच्चे अनाज, लाल धागे तथा बासी भोजन से माता की पूजा करते हैं | शीतला देवी की पूजा मुख्य रूप से ऐसे समय में होती है जब वसन्त के साथ साथ ग्रीष्म का आगमन हो रहा होता है | चेचक आदि के संक्रमण का भी मुख्य रूप से ऋतु परिवर्तन का यही समय होता है |

शीतला माता का वाहन गर्दभ को माना जाता है तथा इनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते रहते हैं | इन सबका भी सम्भवतः यही प्रतीकात्मक महत्त्व रहा होगा कि इस ऋतु में प्रायः व्यक्तियों को चेचक खसरा जैसी व्याधियाँ हो जाती थीं | रोगी तीव्र ज्वर से पीड़ित रहता था और उस समय रोगी की हवा करने के लिए सूप ही उपलब्ध रहा होगा | नीम के पत्तों के औषधीय गुण तो सभी जानते हैं – उनके कारण रोगी के छालों को शीतलता प्राप्त होती होगी तथा उनमें किसी प्रकार के इन्फेक्शन से भी बचाव हो जाता होगा | स्कन्द पुराण में शीतला माता की पूजा के लिए शीतलाष्टक भी उपलब्ध होता है | वैसे शीतला देवी की पूजा करते समय निम्न मन्त्र का जाप किया जाता है:

वन्देsहम् शीतलां देवीं रासभस्थान्दिगम्बराम् |

मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम् ||

अर्थात गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश और मस्तक पर सूप का मुकुट धारण करने वाली भगवती शीतला की हम वन्दना करते हैं | इसी मन्त्र से यह भी प्रतिध्वनित होता है कि शीतला देवी स्वच्छता की प्रतीक हैं – हाथ में झाडू इसी तथ्य की पुष्टि करती है कि हम सबको स्वच्छता के प्रति जागरूक और कटिबद्ध होना चाहिए, क्योंकि चेचक, खसरा तथा अन्य भी सभी प्रकार के संक्रमणों का मुख्य कारण तो गन्दगी ही है | साथ ही, समुद्रमन्थन से उद्भूत हाथों में कलश लिए आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान धन्वन्तरी की ही भाँति शीतला माता के हाथों में भी कलश होता है, सम्भवतः इस सबका अभिप्राय यही रहा होगा कि स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जन साधारण को जागरूक किया जाए, क्योंकि जहाँ स्वच्छता होगी वहाँ स्वास्थ्य उत्तम रहेगा, और स्वास्थ्य उत्तम रहेगा तो समृद्धि भी बनी रहेगी | सूप का भी यही तात्पर्य है कि परिवार धन धान्य से परिपूर्ण रहे |

देवी का नाम भी सम्भवतः इसी लोकमान्यता के कारण शीतला पड़ा होगा कि शीतला देवी की उपासना से दाहज्वर, पीतज्वर, फोड़े फुन्सी तथा चेचक और खसरा जैसे रक्त और त्वचा सम्बन्धी विकारों तथा नेत्रों के इन्फेक्शन जैसी व्याधियों में शीतलता प्राप्त होती है और ये व्याधियाँ निकट भी नहीं आने पातीं | आज के युग में भी शीतला देवी की उपासना स्वच्छता की प्रेरणा तथा उत्तम स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के दृष्टिकोण से सर्वथा प्रासंगिक प्रतीत होती है... विशेष रूप से इस कोरोना काल में तो यही कहा जाएगा...

शीतला देवी की उपासना के लिए स्कन्द पुराण में शीतलाष्टक भी उपलब्ध होता है जो निम्नवत है...

||श्री शीतलाष्टकं ||
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीशीतलास्तोत्रस्य महादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीशीतला देवता, लक्ष्मी (श्री) बीजम्, भवानी शक्तिः, सर्व-विस्फोटक-निवृत्यर्थे जपे विनियोगः ||

ऋष्यादि-न्यासः- श्रीमहादेव ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीशीतला देवतायै नमः हृदि, लक्ष्मी (श्री) बीजाय नमः गुह्ये, भवानी शक्तये नमः पादयो, सर्व-विस्फोटक-निवृत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ||
ध्यानः-
ध्यायामि शीतलां देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम्|
मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम् ||

मानस-पूजनः-
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः| ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः| ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः| ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः| ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः| ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः|
मंत्र : -
'ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः ||

||मूल-स्तोत्र ||
||ईश्वर उवाच ||
वन्देऽहं शीतलां-देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम् |
मार्जनी-कलशोपेतां, शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम् ||1 ||

वन्देऽहं शीतलां-देवीं, सर्व-रोग-भयापहाम् |
यामासाद्य निवर्तन्ते, विस्फोटक-भयं महत् ||2 ||

शीतले शीतले चेति, यो ब्रूयाद् दाह-पीडितः |
विस्फोटक-भयं घोरं, क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ||3 ||
यस्त्वामुदक-मध्ये तु, ध्यात्वा पूजयते नरः |
विस्फोटक-भयं घोरं, गृहे तस्य न जायते ||4 ||

शीतले ! ज्वर-दग्धस्य पूति-गन्ध-युतस्य च |
प्रणष्ट-चक्षुषां पुंसां , त्वामाहुः जीवनौषधम् ||5 ||

शीतले ! तनुजान् रोगान्, नृणां हरसि दुस्त्यजान् |
विस्फोटक-विदीर्णानां, त्वमेकाऽमृत-वर्षिणी ||6 ||

गल-गण्ड-ग्रहा-रोगा, ये चान्ये दारुणा नृणाम् |
त्वदनुध्यान-मात्रेण, शीतले! यान्ति सङ्क्षयम् ||7 ||
न मन्त्रो नौषधं तस्य, पाप-रोगस्य विद्यते |
त्वामेकां शीतले! धात्री, नान्यां पश्यामि देवताम् ||8 ||

||फल-श्रुति ||

मृणाल-तन्तु-सदृशीं, नाभि-हृन्मध्य-संस्थिताम् |
यस्त्वां चिन्तयते देवि ! तस्य मृत्युर्न जायते ||9 ||

अष्टकं शीतलादेव्या यो नरः प्रपठेत्सदा |
विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ||10 ||

श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धाभाक्तिसमन्वितैः |
उपसर्गविनाशाय परं स्वस्त्ययनं महत् ||11 ||
शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता |
शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ||12 ||

रासभो गर्दभश्चैव खरो वैशाखनन्दनः |
शीतलावाहनश्चैव दूर्वाकन्दनिकृन्तनः ||13 ||

एतानि खरनामानि शीतलाग्रे तु यः पठेत् |
तस्य गेहे शिशूनां च शीतलारुङ् न जायते ||14 ||

शीतलाष्टकमेवेदं न देयं यस्यकस्यचित् |
दातव्यं च सदा तस्मै श्रद्धाभक्तियुताय वै ||15 ||

|| इति श्री स्कन्दपुराणे शीतलाष्टकं स्तोत्रं सम्पूर्णम् ||

अस्तु, शीतला माता सभी के मनों को स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करें यही कामना है...

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