भगवान श्रीराम के आदर्श :- आचार्य अर्जुन तिवारी

01 अप्रैल 2021   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (396 बार पढ़ा जा चुका है)

भगवान श्रीराम के आदर्श :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में सुख एवं दुख आते जाते रहते हैं | कभी-कभी परिवार में ऐसी बातें हो जाती है जो कि कष्टकारी होती है परंतु ऐसे समय पर मनुष्य को धैर्य धारण करना चाहिए | धैर्य धारण करना यदि सीखना है तो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जीवन चरित्र से अच्छा उदाहरण और कहीं नहीं मिल सकता | मनुष्य को सदैव समभाव में रहना चाहिए जिस प्रकार भगवान श्री राम का समभाव है | जब उनके राज्याभिषेक की घोषणा हुई तब उनको प्रसन्नता नहीं हुई और जब उन्हें चौदह वर्षों का वनवास प्राप्त हुआ तो उनको कष्ट भी नहीं हुआ | विचार कीजिए जिस पुरुष को प्रातःकाल होते ही राजा बनना था उसका बनवास हो गया परंतु उन्होंने कोई भी प्रतिक्रिया न देते हुए उसे सहर्ष स्वीकार किया | भगवान श्री राम चक्रवर्ती सम्राट दशरथ जी के सुपुत्र थे यदि वे चाहते तो अनेक राजाओं से चौदह वर्ष की अवधि व्यतीत करने के लिए बड़े प्रेम से आश्रय ले सकते थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया | उन्होंने राज सुख त्याग कर केवट एवं वनवासियों को गले लगाया | जिस समय भगवती सीता का हरण हुआ उस समय यदि भगवान राम चाहते तो अनेक राजाओं की सहायता लेकर रावण को परास्त कर सकते थे परंतु उन्होंने धैर्य धारण करते हुए बंदर भालूओं का सहारा दिया क्योंकि वे जानते थे कि कठिन समय में वही सहायता कर सकता है जो निस्वार्थ भाव से आया हो | यदि वे अपनी सहायता के लिए वे राजाओं को बुलाते तो शायद उसमें राजनीति एवं भेदनीति प्रकट होने लगती | भगवान श्री राम का जीवन एक आदर्श जीवन था , उनके प्रत्येक क्रियाकलाप मानव जीवन को एक संदेश देते हुए उदाहरण प्रस्तुत करते हैं | यदि वे चाहते तो वानर राज बाली को अपने साथ मिलाकर रावण को परास्त कर सकते थे परंतु उन्होंने वंचित शोषित सुग्रीव का साथ दिया जिससे यह उदाहरण प्रस्तुत होता है कि मनुष्य को सदैव वंचित एवं शोषितो की सहायता करने का प्रयास करना चाहिए | यद्यपि वे जानते थे कि भगवती सीता लंका में है और रावण का वध करने में सक्षम भी थे परंतु उन्होंने धैर्य के साथ अपने अनुचरों को बड़ाई देने के लिए एक लंबे कालखंड तक युद्ध किया | वनवास अवधि के उपरांत अयोध्या का राजा बनने के पश्चात उन्होंने राज्यधर्म का पालन करते हुए अपने निजी सुख का त्याग किया यदि वे चाहते तो प्रजा का दमन भी कर सकते थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया और अपना जीवन देश एवं समाज के नाम समर्पित कर दिया | यह सत्य है कि हम भगवान श्रीराम तो नहीं बन सकते परंतु उनके आदर्शों का पालन अवश्य करने में सफल हो सकते हैं आवश्यकता है दृढ़ निश्चय की |*


*आज समाज में अनेकों नेता , राजनेता एवं स्वघोषित महापुरुष हमें देखने को मिल जाते हैं परंतु आज यदि कुछ नहीं देखने को मिल रहा है तो वह है धैर्य | आज मनुष्य ने जैसे धैर्य धारण करना ही बंद कर दिया है | क्षण भर में अधीर हो जाना मनुष्य का स्वभाव बन गया है | आज यदि किसी मनुष्य का परिचय किसी राजनेता से हो जाता है तो वह स्वयं को महान गिनने लगता है और अपने से वंचित - शोषित समाज पर वह अपना प्रभाव दिखा कर शासन करने का प्रयास करने लगता है | आज यदि सम्पत्ति के लिए दो भाईयों मैं विवाद होता है तो समाज के प्रभावशाली लोग सक्षम भाई का ही साथ देना पसंद करते हैं | शोषित भाई का साथ कोई नहीं देना चाहता क्योंकि उससे कोई स्वार्थसिद्ध होता नहीं दिखता | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज समाज देख कर यह कह सकता हूं आज किंचित मात्र भी संकट पड़ने पर मनुष्य अपने सगे - संबंधियों और मित्रों को सहायता के लिए पुकारने लगता है वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि उसे अपने पुरुषार्थ पर भरोसा नहीं होता है और वह अपना कार्य अधीर होकर जल्द से जल्द निपटा करके संकट से मुक्ति चाहता है | थोड़ा सा प्रभावी हो जाने या प्रभुता पा जाने पर मनुष्य दूसरों को तिनके की भाँति समझने लगता है | ऐसे समय में हमें भगवान श्रीराम के आदर्शों को याद करने की आवश्यकता होती है कि किस प्रकार उन्होंने क्षण भर में आयोध्या जैसे समृद्धिशाली साम्राज्य का त्याग कर दिया था | आज हम राम जी की जीवन गाथा तो खूब गाते हैं परंतु उसे अपने जीवन में झांकना नहीं चाहते | जिस दिन मनुष्य भगवान श्री राम के आदर्शों का किंचित भी अनुपालन अपने जीवन में करना प्रारंभ कर देते है उसी दिन से उसके जीवन की दिशा एवं दशा परिवर्तित होने लगती है , परंतु आज उपदेश देना बहुत सरल हो गया है और स्वयं उस पर पालन करना उतना ही कठिन | संकट के समय यदि धैर्य धारण कर लिया जाता है तो समय के साथ वह उस समय व्यतीत हो जाता है और मनुष्य को अपने लिए एक दुखद समय प्रतीक्षा करता हुआ मिलता है | आवश्यकता है भगवान राम की आदर्शों एवं उनके द्वारा स्थापित की गई मर्यादा का अवलोकन करके उस पर चलने की |*


*राष्ट्रधर्म , राजधर्म , पुत्रधर्म , भातृधर्म , सखाधर्म एवं पतिधर्म का उदाहरण एक साथ यदि कहीं देखने को मिलता है तो वह है भगवान श्रीराम का जीवन चरित्र जो हमें जीवन जीने की कला सिखाता है |*

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