मनुष्य की पूर्णता

04 अप्रैल 2021   |  chander prabha sood   (430 बार पढ़ा जा चुका है)

मनुष्य की पूर्णता

माता के बिना मनुष्य का जीवन कभी पूर्ण नहीं होता बल्कि उसमें अधूरापन रह जाता है। माता जिसने मनुष्य को जन्म दिया है, इस संसार में लाने का महान दायित्व निभाया है, उसका पालन-पोषण करने के लिए अनेक कष्ट सहे हैं, उस माँ की अनदेखी उसे भूलवश भी नहीं करनी चाहिए। माता की आवश्यकता मनुष्य को जीवन के हर कदम पर  पड़ती है।
        कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई बच्चा जन्म से विकलाँग होता है। दुनिया में चाहे लोग उसे हिकारत से या दया की दृष्टि से देखें परन्तु माता की ममता में उसके लिए शेष स्वस्थ बच्चों की तरह कोई कमी नहीं आती। उसके लालन-पालन में वह अपनी ओर से कभी कोई कोरकसर नहीं रखती।
      उसके प्रति विशेष स्नेह रखते हुए, हर तरह से उसका साथ निभाती है। मैंने कई माताएँ ऐसी भी देखी हैं जो लाचार बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए अपने कैरियर तक को भी दाँव पर लगा देती हैं परन्तु अपने इन बच्चों को नहीं छोड़तीं।
          वह सदा उसे अपने जीवन में आगे कदम बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती रहती है। उसका प्रयास यही होता है कि उसका कमजोर बच्चा अन्य बच्चों की तरह अपना नाम रौशन करे और किसी की कृपा का पात्र न बने।
        बहुत से विकलाँग बच्चे साधारण बच्चों की तरह स्कूल जाकर अपनी पढ़ाई करते हैं। कालेज और यूनिवर्सिटी की शिक्षा समाप्त करके उच्च पदों पर कार्यरत होते हैं। कुछ बच्चे शोधकार्य करके अपना नाम कमा रहे है। आजकल ये बच्चे ओलम्पिक खेलों में भी अपने झण्डे गाड़कर नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। सच में वे माताएँ धन्य हैं जिनके अथक प्रयास से उनके बच्चे समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।
        इसी तरह दूसरों की नजरों में दिखने वाला बदसूरत बच्चा भी अपनी माता की आँखों का तारा होता है। वह उसके प्यार-दुलार में कहीं कोई कमी नहीं रखती। उसके समुचित विकास के लिए अनथक प्रयास करती है।
         माता अपने सभी बच्चों के प्रति अपने दायित्वों को बड़ी मेहनत और लगन से निभाती है। इसीलिए हर बच्चे को अपनी माँ की गोद में आकर ही हर प्रकार की सुरक्षा का अहसास होता है। उससे अलग होने के बारे में बच्चा अपने मन में कभी सोच भी नहीं सकता।
          योग्य बनकर, अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद युवाओं के मन में अपने माता-पिता से अधिक बुद्धिमान होने का प्रायः व्यर्थ ही अभिमान होने लगता है। वे भूल जाते हैं कि उन्हें इस अवस्था तक पहुँचाने का कार्य उन्हीं माता और पिता ने ही किया है।
        मनुष्य अपने कैरियर की बुलन्दियों को चाहे छू ले, कितनी ही ऊँची उड़ान क्यों न भर ले परन्तु उसका जीवन तभी सफल होता है जब वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहे। उसकी अपनी माता उससे सन्तुष्ट और प्रसन्न रहे। उसका जीवन उस समय शून्यवत होता है जब वह अपनी माता से वियुक्त हो जाता है।
        स्कन्धपुराण हमें बता रहा है कि एक मनुष्य का जीवन कब शून्य होता है-
        तदा स वृद्धो भवति  तदा  भवति दुखित:।
        तदा शून्यं जगत्तस्य यदा मात्रा विमुच्यते॥ 
अर्थात मनुष्य तभी वृद्ध होता है, तभी दुखी होता है और तभी उसके लिए जगत शून्य होता है जब उसकी माता से उसका वियोग होता है।
          यह श्लोक स्पष्ट शब्दों में समझा रहा है कि जब तक उसकी माता जीवित होती है, तब तक वह बच्चा रहता है। उसकी घर-परिवार में लेनदेन अथवा व्यवहार आदि की सारी जिम्मेदारियाँ वह ओट लेती है। जब उसकी माता का उससे वियोग होता है तब संसार और उसके कार्यकलाप उसे अच्छे नहीं लगते। तभी उसे संसार शून्य की तरह लगने लगता है।
          माता और सन्तान का सम्बन्ध तोड़े से भी टूटने वाला नहीं होता। यह सम्बन्ध आजीवन बना रहता है। बच्चे यदि उसकी तरफ से मुँह मोड़ लें तब भी माता उनका हित चाहती है। माता से ही उसकी सन्तान की पहचान होती है। उसमें छेद करने वाले बच्चे कृतध्न कहलाते हैं। बच्चों को अपनी भावी पीढ़ी के समक्ष अपनी माता के प्रति दायित्वों का निर्वहण करके एक उदाहरण स्थापित करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सू

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