नक्सलवाद का अंत सरकार की दृढ इच्छा शक्ति पर निर्भर है

06 अप्रैल 2021   |  शोभा भारद्वाज   (466 बार पढ़ा जा चुका है)

नक्सलवाद का अंत सरकार की दृढ इच्छा शक्ति पर निर्भर है

नक्सल वाद का अंत सरकार की दृढ इच्छा शक्ति पर निर्भर है

डॉ शोभा भारद्वाज

नक्सलवाद से हम जूझ रहे हैं उसकी शुरूआत पश्चिमी बंगाल के गावँ नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आन्दोलन द्वारा क्रान्ति की विचार धारा से हुई थी यह कम्यूनिस्ट विचारधारा के बीच में पनपने वाला आन्दोलन है इनके थिंक टैंक शहरों में रहते हैं .इसके असली जनक कानू सान्याल हैं वह पश्‍चिम बंगाल के सीएम विधानचंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में जेल भी गए थे वहाँ उनकी मुलाक़ात चारू मजूमदार से हुई जो माओं के परम भक्तों में से एक थे .दोनों ने बाहर आ कर सरकार और व्‍यवस्‍था के खिलाफ सशस्‍त्र विद्रोह का रास्‍ता चुना . इनका मानना हैं भारत में मजदूरों और किसानों की बदहाली के लिए सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं क्योंकि सत्ता एवं प्रशासन पर उच्च वर्ग ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था का लाभ उठा कर कब्जा जमा लिया हैं अत: एक सशस्त्र क्रान्ति के द्वारा ही न्याय विहीन व्यवस्था को बदल करवंचितों और शोषितों के अधिकारों की रक्षा हो सकेगी .सत्तर के दशक में कालेज की दीवारों पर छात्रों के लिए नारे गढ़ कर लिखे गये थे जैसेसत्ता का जन्म बंदूक गोली से होता हैकिशोरावस्था से जवानी में पदार्पण करते आयु के जवान बहुत संवेदन शील तथा उनमें कुछ कर गुजरने की भावना होती है बहस छिड़ी चीन और भारत में राजनीतिक परिवर्तन एक साथ हुआ लेकिन कम्यूनिस्ट चीन ने तरक्की कर ली भारत पीछे क्यों रह गया ?

हम भूल गये कम्यूनिस्ट चीन की हालत माओ काल में अकाल पड़ा चीनी हर जानवर हर अंग खाने लगे जो भी जानवर मिल जाता उसी को ले आते घर में हाट पाटमें पानी में मिर्च डाल कर उबालते जो भी जीव मिल जाता उसी को उबलते पानी में डाल देते यही उनका उस दिन का भोजन था . 1978 में माओ की मृत्यू के बाद सत्ता डेंग जियोपिंग के हाथ में आ गयी सच्चे अर्थों में चीन की तरक्की में उन्हीं का हाथ है .

नक्सलवादी विचारकों में कुछ ने समझा भारतीय जन मानस की समझ में गोली ,बंदूक व खून खराबा की भाषा नहीं आती . ‘न गरीब जिन्हें यह वंचित कहते हैं के दिन सुधरे न विचारधारा के समर्थकों के अच्छे दिन आये हाँ कई राज्यों में हिंसा से सैकड़ों निर्दोषों की जान अवश्य गयी .आंदोलनों ने मुख्यतया आदिवादी क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ा कर राजनीतिक पार्टियों के साथ संबंध जोड़े अब माओवादी चुनाव जीत कर संसद में भी पहुंच गये हैं .इनमें सफेद पोश नक्सली समाज का सुखी सम्पन्न वर्ग देश में ही नहीं विदेशों तक में नक्सलियों के पक्ष में शोर मचा कर उनके लिए समर्थन जुटाते हैं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मानवाधिकार की दुहाई देते हुए खुल कर सामने आते हैं इनका शोर टीवी चैनलों में भी सुना जा सकता है.

सशस्त्र नक्सली नक्सलवाद के पनपने का कारण गरीबी और विकास के न होने पर जोर देते हैं जिससे यहाँ के निवासियों में असंतोष पनपता है जबकि यहाँ विकास की गति धीमी रहने का कारण नक्सलियों के हमले हैं .जंगलों में सीआरपीएफ पर आदिवासियों के औरतों बच्चों को आगे कर घात लगा कर , छिप कर वार कर सत्ता को चुनोती देते हैं. 6 अप्रैल, 2010 को सुकमा में नक्सलियों ने खून की होली खेलते हुए 76 सीआरपीएफ जवानों को मौत की नींद सुला दिया था. यूपीए की सरकार के गृहमंत्री पी चिंदबरम नक्सलियों के खिलाफ एयरफोर्स का इस्तेमाल करना चाहते थे उनका जम कर विरोध हुआ मोदी जी भी नक्सलवादियों द्वारा किये गये नर संहार पर तुरंत सेना लगाने से परहेज करते नजर आते हैं .

सुकमा पहुचने के मार्ग में खूबसूरत नजारे घाटियाँ घने जंगल मन को मोहते हैं लेकिन जगह जगह विस्फोटों से टूटी सड़कें हैं अर्द्ध सैनिक बलों के कैंप छावनी जैसे लगते हैं. यहाँ नक्सलियों के मनमाने साम्राज्य की सीमा शुरू हो जाती है आदिवासी चाहते हैं सड़कें बने मोबाईल टावर लगें वह शहरों से जुड़ें लेकिन बनती सड़कें सीआरपीएफ जवानों के खून से रंगी जा रही है आदिवासियों को समझाया जाता है वनों पर तुम्हारा अधिकार है तुम्हें यहाँ से निकल दिया जाएगा तुम शहरों में मजदूरी के लिए विवश हो जाओगे . सोवियत संघ के टूटने के बाद मार्क्सवाद कमजोर पड़ने लगा चीन भी माओ वादी विचार धारा से धीरे-धीरे पीछे हट रहा है लेकिन भारत क्रान्ति द्वारा व्यवस्था परिवर्तन के नारे ,लाल सलाम ,अलगाव वाद, यही नहीं सुराज का स्थान स्वराज ने ले लिया है . चंदा विदेशों से भी आता है बंदूक उनकी है कंधे सफेद पाशों के चलाने वाले नक्सलाईट यह कहीं बाहर से नहीं आये यही के नौजवान हैं .

इस साल का यह सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ हमले का नेतृत्व नक्‍सली कमांडर हिडमा ने किया . 22 जवान शहीद हुए 31 जख्मी जिनमें कोबरा कमांडो भी थे. हमलावरों के पास अत्याधुनिक हथियार थे इन्होने अर्धसैनिक बलों को तीन तरफ से घेर लिया .क्या इन नक्सलाईट को आतंकी मान कर सरकार दृढ इच्छा शक्ति से इन्हें समाप्त नहीं कर सकती ?

मैं वर्षों ईरान के खुर्दिस्तान में रही हूँ वहाँ इराक समर्थित आजाद खुर्दिस्तान की जंग चल रही थी लगभग सभी घरों के खुर्द नौजवान ,युवक अधेड़ बंदूक हाथ में लेकर जंगलो में निकल गये थे उन्हें पिश्मर्गा और कोमिल्ला कहते थे .खुर्दिस्तान की बीहड़ पहाड़ियों में बसे गावों के पास से पहाड़ी नदी बहती है हर गावँ के पास सेना की छावनियां बनी थी रात जैसे गहराती छावनी से गोलों बन्दूको की आवाज से घाटियाँ गूँज उठती इधर कोमिल्लाओं की बंदूके गरजती कुछ देर में सब कुछ शांत हो जाता खुर्दिस्तान में प्रवेश द्वार पर रात को आने वाली बसों की लंबी कतार लग जाती सुबह सूरज निकलने के बाद बख्तरबंद मशीनगनों से लेस गाड़ियां आती उनकी सुरक्षा के घेरे में बसों का काफिला चलता शाम को पाँच बजे के बाद रास्ते बंद कर दिए जाते . यदि सरकारी रिवोल्यूशनरी गार्ड इन विद्रोहियों की पकड़ में आ जाते यह उनकी गर्दने काट देते . पूरी रात कोमिलाओं और सरकारी अमले के बीच लड़ाई चलती .

दृढ इच्छा शक्ति बड़ी से बड़ी समस्या का हल खोज लेती है आगा इमाम खुमैनी ने विद्रोहियों से अपील की इस समय सीमा में आप शस्त्र त्याग कर सरेंडर कर दें सबको माफ़ कर दिया जाएगा . हजारो विद्रोही अपने घरों से दूर जंगलों में रहते लड़ते – लड़ते थक चुके थे अब शांति से जीना चाहते थे लेकिन सरेंडर करने से पूर्व भय से कांप रहे थे पता नहीं उनके साथ अब क्या होगा .समय सीमा समाप्त होने के बाद एक दिन संन्नदाज खुर्दिस्तान की राजधानी की ऊंची पहाड़ी पर जिन गावों में विद्रोहियों ने ठिकाने बना लिए थे तोपों से निशाने लगा कर गोले छोड़ें गये तोप के मुहँ से गोले निकलते समय भयंकर आवाज होती जहाँ गोला गिरता वहाँ भी भयंकर आवाज के साथ आग लगती 50 घंटे तक मौत का तांडव चला साथ ही चेतावनी ‘गावँ वालों विद्रोहियों को घर से बाहर निकाल दो नहीं तो यह गोले अब तुम्हारे घरो पर गिरेंगे’ .अचानक गरजती तोपें शांत हो गयी आकाश में प्लेन मंडराने लगे अस्पताल के ऊपर से घूम कर उन गावों के बाहर बड़े बड़े बम बरसाने लगे जहाँ विद्रोही छिपे थे . अब पैदल सेना धीरे – धीरे बढ़ी जो मर चुके थे उन्हें गाड़ियों में भर लिया जो घायल थे उनको जीपों से बाँध लिया ------- सरकारी अमला नारे लगाता उन्हें ले जा रहा था देखना असहनीय था लोगों ने घरों के दरवाजें बंद कर लिए .

दो महीने बाद खुर्दिस्तान का हर क्षेत्र सुरक्षित हो गया सब रास्ते खुल गये, कालेज खुल गये अब विद्रोही नौकरियां कर रहे थे कुछ के विवाह हो गये किशोर कालेज में एडमीशन की तैयारी कर रहे थे उनमें कुछ डाक्टरी कुछ इंजीनियरिग पढ़ने लगे हर और खुशहाली थी

ईरान खुर्दिस्तान की दुर्गम पहाड़ियों का चित्र यहाँ विद्रोहियों की आतंकी गतिविधियों को रोका गया था .




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