भगवती सीता की खोज ,लंका में संकट मोचन हनुमान का प्रवेश

04 मई 2021   |  शोभा भारद्वाज   (467 बार पढ़ा जा चुका है)

भगवती सीता की खोज ,लंका में संकट मोचन हनुमान का प्रवेश

भगवती सीता की खोज , लंका में संकट मोचक हनुमान का प्रवेश

डॉ शोभा भारद्वाज

विशाल सागर को पार कर श्री हनुमान लंका पहुंचे लेकिन नगर में प्रवेश कैसे करें ?वह एक ऊँचे घने वृक्ष की छाया में घुटनों के बल बैठे थे उन्होंने हाथ जोड़ कर कहा मेरा श्री राम पर अटूट विश्वास है वही मुझे मार्ग दिखलायेंगे .सामने चारो तरफ समुद्र से घिरी विश्व प्रसिद्ध सोने की लंका अपनी कीर्ति के साथ जगमगा रही थी चारो तरफ सुद्रढ़ दीवारों से सुरक्षित एक अभेद किला थी .जागरूक प्रहरी राक्षसियां शस्त्रों से सुसज्जित इसकी रक्षा कर रही थी. आकाश में बादल छाये हुए थे मंद पवन चल रही थी चन्द्रमा से बदली हट गयी अब पूर्णमासी का चन्द्रमा आकाश में चमकने लगा समुद्र में ऊँची लहरें पूरे ज्वार पर थीं .रात्री का दूसरा प्रहर हनुमान के लिए सुअवसर था ,देर रात तक आमोद प्रमोद से थक कर हर ओर से सुरक्षित लंका सो रही थी हनुमान जी नें लघू रूप धारण कर नगर में प्रवेश किया नगरी अत्यंत सुंदर थी मुख्य मार्ग के दोनों तरफ महल थे उनके आगे फलदार वृक्षों की कतारें लगी थी भवनों के पीछे बाग थे वह हर महल की बालकनी पर निशब्द चढ़ कर उनके गवांक्ष से झांक रहे थे.

लंका के निर्माण की एक पौराणिक कथा है भगवान शिव वैरागी वेश में कैलाश धाम में रहते थे परन्तु पार्वती ने जिद ठान ली उनके रहने के लिए अनुपम नगरी बनाई जाए विश्वकर्मा स्थान की खोज करने लगे उन्होंने समुद्र से घिरे द्वीप में प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर तीन पर्वत शिखर देखे उन्हें नगरी के निर्माण के लिए क्षेत्र भा गया उन्होंने अपनी सम्पूर्ण कला का परिचय देते हुए सोने की अद्भुत नगरी निर्मित की .गृह प्रवेश के लिए विश्रवा को आचार्य नियुक्त किया गया लेकिन यज्ञ की समाप्ति बाद उन्होंने दक्षिणा में शिव जी की माया से वशीभूत होकर लंका मांग ली शिव ने कहा तथास्तु .विश्रवा से नगरी उनके पुत्र कुबेर को मिली उन दिनों पराक्रमी रावण अपनी शक्ति बढ़ा रहा था उसने दक्षिण एशिया के कई द्वीपों पर विजय पा ली अब उसे सुरक्षित राजधानी चाहिए थी जिसके केंद्र से वह अपना साम्राज्य मजबूत कर रक्ष संस्कृति का प्रसार कर सके उसने अपने सौतेले भाई कुबेर को लंका से निकाल कर अपनी राजधानी बनाया . त्रिकुट पर्वत की तीन पहाड़ियों के समतल पर निर्मित लंका ऐसी लगती थी मानों बादलों में बसी हो चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार थे.

राजधानी के बीचो बीच लंका पति रावण का महल शिल्प कला का अनुपम उदाहरण था. राजमहल अनेक खम्बों पर टिका था हर और भव्यता ही भव्यता थी . यहाँ पहरा और भी सख्त था ,वानर को कौन रोक सकता है हनुमान नें धीरे से दीवार फांदी देखा महलों के चारो ओर विशाल बाग हर किस्म के फलों एवं फूलों की सुगंध से महक रहा था महल के बाग़ में पुष्पक विमान खड़ा था जिसे रावण ने अपने सौतेले भाई कुबेर से छीना था इसी विमान से रावण सीता को हर लाया था लम्बे चौड़े विमान में हर वैभव मौजूद था उन्होंने विमान के हर कोने में सीता को खोजा लेकिन विमान में कोई नहीं था रावण के विशाल महल में बिल्ली के समान छोटा रूप धारण कर सीता को खोजने लगे वह रावण के अंत:पुर में गये सबसे सुसज्जित प्रकोष्ट रावण का शयन कक्ष था वह एक पर्दे के पीछे पीठ लगा कर चारो तरफ देखने लगे उनकी तेज खोजी आँखें अँधेरे में चमक रही थीं .वहाँ अनेक रूपसी रानियाँ जिन्हें रावण जबरन ब्याह लाया था पलंगों पर सोयी हुई थीं हनुमान कुछ देर के लिए ठिठक गये महिलाओं के प्रकोष्ठ में जाकर उन्हें निहारना अच्छा नहीं लगा ,लेकिन वह राम के काज के लिए यहाँ आये थे मजबूरी थी एक बड़ा पलंग जिस पर सफेद सिल्क की छतरी लगी थी पलंग पर पीली सिल्क की चादर बिछी थी उस पर रावण गहरी नींद में सोया था उसके माथे पर लाल रंग का चन्दन लगा था कानों में भारी कुंडल उसका मुख मंडल वीरोचित तेज से चमक रहा था . वह नवजात हिरन के बच्चों की खाल के मुलायन तकियों पर सिर टिकाये सुखनिद्रा में सोया था . रावण के शयनकक्ष के बाहर सुरा पान कक्ष था वही लम्बी मेज पर खाने के अनेक अनखाये भोज्य पदार्थ सजे थे हनुमान मेज पर चढ़ कर अनुपम योद्धा को निहारने लगे जो कमर में मृगछाला पहने हाथ में फरसा लेकर जिधर से निकलता था विजय ही विजय थी वह अपने में ही शक्तिशाली सेना था अपनी भुजाओं के बल पर उसने साम्राज्य बनाया था. हनुमान को अचानक भूख लग आई उन्होंने मेज पर रखे कुछ तरबूज खाये उनकी नजर अलग पलंग पर सोई हुई अप्रतिम सुन्दरी पर पड़ी क्या यह भगवती सीता हैं नहीं उन्होंने अपना सिर धुना ऐसा शर्मनाक विचार उनके मन में क्यों आया ?सीता जैसी पावन स्त्री कभी यहाँ नहीं हो सकती यह अवश्य मय दानव की पुत्री लंका की साम्राज्ञी मन्दोदरी हैं .

महल के बाग़ का हर कोना देखा अब सीता की खोज करते_करते वह निराश हो कर दीवार से पीठ लगा कर बैठ गये लम्बी सांस लेकर अपने आप से बातें करने लगे रावण जैसे महा दुष्ट ने अवश्य उनको मार दिया होगा , उसकी पकड़ से छूट कर समुद्र में गिर गयी होंगी, उनकी सांस घुट गयी होगी या रावण ने उनको अपने हाथों से पीस दिया होगा वह अपनी आखिरी साँस तक बेबस हे राम –हे राम पुकार रही होंगी यहाँ उनका कोई रक्षक नहीं था ? हनुमान की आँखों से आंसू बहने लगे गला रुंध गया वह सुबकने लगे मैं हार सह नहीं सकता यहीं अपना जीवन समाप्त कर लूंगा उन्होंने अपने पंजों से अपने मुहँ को ढक कर आखिरी सांस लेकर सांस रोक ली . हनुमान के हर शब्द को लंका में बहने वाली वायू ने सुना उनके देवता पवन देव अपने पुत्र के कानों में फुसफुसाये हवायें तेज होती गयीं पेड़ों से पत्ते गिरने लगे ,वृक्ष चरमराने लगे लंका के महलों पर लगी झंडियाँ टूट-टूट कर गिर रहीं थीं लंका में वायु ने कभी अपना संतुलन नहीं खोया था समस्त ब्राह्मंड के देवों पर राक्षस राज का अधिकार था अब ?हनुमान ने आँखें खोली अपनी उँगलियों के अंदर से झाँक कर देखा तेज हवायें उनके सिर के ऊपर से बह रहीं थीं उनके बाल पीछे चिपक गये उनके कानों से आवाज टकराई मेरे पीछे आओ, हनुमान उठ खड़े हुए आंधी की दिशा में चलने लगे हवा का बहाव हल्का होता गया वह ठहर गये सामने ऊँची चारदीवारी से घिरी वाटिका थी अपने शरीर से धूल झाड़ी रावण के महल के पीछे की वाटिका, बाहर से जंगल लग रही थी ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के झुरमुट से घिरी वाटिका में , जंगली , फलदार एवं लाल एवं पीले फूलों के वृक्ष लेकिन सबसे अधिक अशोक के वृक्ष थे कुशल मालियों ने वन को बाग़ की तरह संवारा था .

सूर्योदय होने वाला था पंछी चहचहाने लगे उनकी आवाज में दर्द था चौकड़ियाँ भरते हिरन दुखी थे मानों दुःख ने वाटिका में मूर्त रूप धर लिया हो . समुद्र की दिशा से सूर्य ऊंचा उठने लगा वह ऊंचे घने शीशम के पेड़ पर चढ़ गये जिसके पत्ते सुनहरे थे उन्होंने देखा सामने प्राकृतिक तालाब हैं जिसमें झरने से बह कर आने वाली सरिता का जल निरंतर गिर रहा था उसमें से निकलने वाली छोटी-छोटी नालियों में जल बहता हुआ अशोक वाटिका को सींच रहा है . सीता अवश्य यहीं होंगी वह वर्षों से जंगलों में रह रही है वहीं किसी झरने या तालाब में स्नान करती थीं अवश्य यहाँ आयेंगीं हनुमान ने सुना लंका के पुजारी मन्दिरों में भोर के स्वागत के लिए सस्वर मंत्रोच्चार कर रहे हैं .महल में चारण रावण की प्रशंसा में राजा को जगाने के लिए गीत गाने लगे अशोक वाटिका में भद्दी राक्षसियां जिनके पपोटे शराब का अत्यधिक सेवन करने से भारी हो गये थे अभी रात का नशा कम नहीं हुआ था अपनी प्रतिदिन की दिनचर्या में लग गयीं पहरा बदला जा रहा था .



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