हंसों का जोड़ा

15 जुलाई 2021   |  शोभा भारद्वाज   (383 बार पढ़ा जा चुका है)

हंसों का जोड़ा

हंसो का जोड़ा

डॉ शोभा भारद्वाज

देखने वाले उन्हें हंसों का जोड़ा कहते थे .दोनों का एक ही गली में घर था आते जाते नजर टकरा जाती पता नहीं चला कब प्रेम हो गया दोनों छिप कर मिलने लगे लड़की का नाम मंजू था उसके पिता मन्दिर के पुजारी थे पंडिताई करते थे . घर का बड़ा बेटा विवाहित था उसकी अपनी चलती दुकान थी . पंडित जी की इच्छा थी बेटी पढ़ लिख कर पैरों पर खड़ी हो जाये सुयोग्य वर देख कर विवाह कर देंगे . प्रेम अंधा होता है कम उम्र का प्रेम तो और भी अंधा एक दिन अशोक घर आया उसने पंडित जी से उनकी बेटी का हाथ माँगा पंडित जी हैरान अभी तो लडकी ने इंटर भी नहीं किया है शादी ? दोनों के माता पिता की तरफ से भी भारी विरोध हुआ शादी करेगा न कुछ काम न धंधा है पत्नी का खर्च कैसे उठायेगा ? अशोक ने एक कम्पनी में जो मिली हल्की नौकरी कर ली मंजू के 18 वर्ष होने का इंतजार किया दिल्ली की हल्की बस्ती में चुपचाप एक कमरा ले लिया दोनों ने घर से भाग कर आर्य समाज में शादी कर ली .

पिता दुनिया की कुंडली का मिलान करते थे बेटी ने मौका ही नहीं दिया दोनों परिवार नाराज थे . एक दिन लडके के पिता बेटे के घर आये देखा जमीन पर चटाई बिछा कर उस पर गद्दा ,एक लंबी रस्सी बंधी थी उस पर प्लास्टिक की थैलियों में गृहस्थी का सामान लटक रहा था एक और कपड़े कुछ बर्तन खाना पकाने के लिए स्टोव पहले उन्हें हंसी आई लेकिन फिर हंसी रोक कर मंजू से कहा ताला चाबी है दो ,चलो घर बहु ससुर के पीछे – पीछे चल दी पापा जी बेटे के लिए चिट्ठी छोड़ आये उन्हें ख़ुशी थी बहू ने बिना तर्क के उनकी बात रख ली .घर के नुक्कड़ पर हलवाई की दुकान पर स्कूटर रोक कर पूछा कुछ खाया है ‘नहीं’ उन्होंने समोसे रसगुल्ले खरीद लिये घर पहुंच कर बहू को बरामदे में बिठाया पानी का एक गिलास और प्लेट मे दो समोसे और रसगुल्ले रख कर कहा खाओ बहू ससुर के तेवर देख कर चुपचाप खाने लगी .माँ कमरे से लंबी स्कर्ट पहने माथे से शुरु लंबी भरी मांग हाथ में लाल चूड़िया पहने बड़ी – बड़ी आँखों वाली भोला चेहरा बच्ची सी लगने वाली सहमी बहू को निहार रही थी मन में ममता हिलोरें लेने लगी .

रात को सपुत्र भी घर आ गया पहले घर वालों ने उसे खरी खोटी सुनाई फिर आलमारी से माँ ने अपनी लाल साड़ी निकाल कर बहू को पहनाई मंजू से साड़ी सम्भल नहीं रही थी माँ ने दोनों की आरती उतार कर गृह प्रवेश कराया दोनों ने बेटे बहू को गले लगाया .अशोक ने ग्रेजुएशन पूरा नहीं किया था अब पढ़ाई पूरी की अच्छी कम्पनी में नौकरी लग गयी बड़ी मेहनत से नौकरी की उसका बॉस उससे बहुत खुश था. दुर्भाग्य से पिता ऐसे बिमार पड़े उनकी मृत्यू हो गयी कुछ दिन बाद माँ भी चल बसी किराये का घर था उसे खाली कर कम्पनी के पास कमरा ले लिया मकान मलकिन बहुत अच्छी थी वह उसको आंटी कहते विधवा संतानहीन आंटी इनका बहुत ध्यान रखती थी. जिन्दगी बहुत अच्छी चल रही थी अशोक समय पर घर आता कभी – कभी टूर पर जाना पड़ता मंजू उदास हो जाती . दोनों जब घर से बाहर कहीं जाते दोनों आपस में मस्त हंसते बोलते देख उन्हें लोग हंसो का जोड़ा कहते थे जब मंजू अशोक को तिरछी नजर से निहारती वह निहाल हो जाता दो प्यारी बच्चियों का जन्म हुआ सब अच्छा चल रहा था .

दुर्भाग्य से अशोक को शराब पीने की आदत पड़ गयी बहुत समझाया उसके पास बहाना था इतना थक जाता हूँ पूरा बदन दर्द करता है पी के ही नींद आती है क्या करूं? यदि तरक्की करनी है सामने वाले से आर्डर लेने के लिए उसके साथ पीना पड़ता है सेल्स मैनेजर की नौकरी है .पहले बाहर से पीकर आता था अब घर में पीने लगा मंजू हैरान थी पीना बढ़ता जा रहा था उसका पहले से स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं था उसे भूख लगनी बंद हो गयी जिगर के पास दर्द उठने लगा धीरे – धीरे बढ़ता गया ऐसा लगता जैसे पेट में चाकू मारा जा रहा है वही हुआ जिसका डर था खून की उलटी हुई अस्पताल में भर्ती के साथ इलाज शुरू हुआ मंजू का घर अस्पताल बन गया था वहीं पति के पास बैठी रहती अशोक की हालत में धीरे – धीरे सुधार हो रहा था अस्पताल से छुट्टी के साथ डाक्टर साहब ने समझाया एक घूँट शराब का अब जहर है कम्पनी का बास अशोक के अच्छे काम की कद्र करता था कितना भी पैसा लगे कम्पनी की तरफ से इलाज होगा . घर बैठे महीने की तनखा आती रहती .अशोक लाचार नजरों से पत्नी एवं बच्चियों की तरफ देखता रहता . एक दिन सुबह मंजू उठी उसने सोचा नाश्ता बना कर तब बच्चियों और अशोक को उठाऊँगी नाश्ता तैयार कर चाय चढ़ा दी अब उसने पति को आवाज दी वह उठा नहीं हिलाया बेकार ध्यान से देखा ओंठ की कोर से हल्का झाग निकला था शरीर में जान नहीं थी बच्चियां भी अब तक उठ गयीं थी पापा – पापा चिल्लाने लगी .पिता भाई को फोन किया जानकार इकठ्ठे हो गये कम्पनी वाले भी आ गये दो बच्चियों पत्नी को निसहाय छोड़ वह सदा के लिए जा चुका था अशोक को ले जाया जा रहा था मंजू बुत बनी हुई थी बेटियाँ खामोश .

पिता चाहते थे विधवा बेटी को घर ले जायें भाई भी चाहता था लेकिन उसकी पत्नी ने साफ़ मना कर दिया फंड का पैसा मिलेगा कुछ काम कर जिन्दगी काटे जब घर से भागी थी तुमसे पूछा था यदि लाओगे मैं बच्चों के साथ घर छोड़ दूंगी अपनी गृहस्थी की कीमत पर सहारा देना भाई को मंजूर नहीं था .मकान मालकिन ने सहारा दिया उसने घर का छोटा कमरा कम से कम किराये पर उसे डे दिया सामान बहुत था मंजू पलंग बेचना चाहती थी लेकिन अशोक ने पलंग पर प्राण त्यागे थे कोई खरीदने को तैयार नहीं हुआ अंत में कबाड़ी ले गया आंटी ने समझाया कपड़ों की रिपेयर का काम कर लो आजकल न घर में मशीन है न महिलाओं को सीना आता है .मंजू ने अपने को सम्भाला सामने पहाड़ सा जीवन दो बच्चियां थीं घनी आबादी में घर था लोगों को उससे सहानुभूति भी थी उसने पिको , साड़ी में फाल लगाना कपड़े रिपेयर का काम शुरू कर दिया एक बेटी को झूले पर लिटा देती दूसरी शांत पास बैठी रहती धीरे – धीरे खर्चा निकालने लगी रिपेयर में अच्छे पैसे मिल जाते थे .आंटी की सलाह पर फंड का पैसा बच्चियों के नाम पर जमा कर दिया समय कटता रहा .

उसे अकसर महसूस होता अशोक की आत्मा उसके आसपास है जब बहुत थक जाती ऐसा लगता उसके बालों को वह सहला रहा है फिर सोचती उसका वहम है बड़ी बेटी स्कूल के लायक हो गयी आंटी उसके लिए माँ के समान थी उसने मंजू को रोने नहीं दिया .एक दिन आंटी के पास फोन आया रिश्ते का भतीजा अस्पताल में अपनी पत्नी का इलाज करवाने आया है वह तीन बार गर्भवती हुई लेकिन बच्चे का मुहँ देखना नसीब नहीं हुआ अबकी बार बच्ची और माँ दोनों ही नहीं बचीं . आंटी कई दिन तक सोच में डूबी रही एक दिन मंजू के पिता के पास गयी, आप चाहें तो मंजू के रिश्ते की बात चलाऊँ लेकिन पंडित जी को समझ नहीं आ रहा था दो बच्चियों की माँ को कौन अपनाएगा .मंजू से बात की दुनियादारी समझाई आज मैं हूँ कल नहीं रहूंगी तब क्या होगा मंजू की बुद्धि सो गयी थी .

आंटी ने स्वयं बात चलाई आनन्द उसकी माँ से मिलने उनके घर गयी उन्हें समझाया अपने घर बुलाया नन्हीं मासूम बच्चियां माँ से चिपकी बैठी थी मंजू सिर झुकाए निर्जीव सी हो रही थी आनन्द ने बच्चियों की तरफ देखा वह बच्चों के लिए तरसा हुआ था उसने स्वीकृति दे दी . आंटी अशोक के कम्पनी के बॉस के पास गयीं उनसे रिश्ते के बारे में बताया परन्तु आप तसल्ली कर लो बॉस ने अपनी तरफ से जानकारी हासिल की उन्हें कहीं कमी नजर नहीं आई आनन्द तीन भाई थे यह सबसे छोटा था इसके पास माँ रहती थी लड़के का अपना मकान , नौकरी अच्छी थी माँ की भी पेंशन आती थी . मंजू ने आंटी से कहा जिस डाल पर वह बैठी टूट गयी ससुर गये सास गयी पति भी नहीं रहे. रात को मंजू ने देखा अशोक सामने खड़े मुस्करा रहे हैं हाथ हिलाया चले गये वह रोकना चाहती थी गले से आवाज नहीं निकली सपना था . यह शादी भी अपने में उदाहरण थी अबकी बार फेरे हुए स्टेज पर आनन्द मंजू दोनों बेटियाँ बैठी थी लोगों ने उपहार दिए समाज के सम्मानित लोगों के सामने आनन्द ने बच्चियों के सिर पर हाथ रख कर कहा वह बच्चों के लिए तरसा है यह मेरी अपनी बच्चियां हैं . बेटियों ने जब आनन्द को पापा कहा उसकी आँखें भर आई उसे लगा उसके अपने बच्चे जी उठे उसने बच्चियों को गले से लगाया . मंजू की विदाई हुई उसको लगा अशोक की आत्मा तृप्त हो कर मुक्त हो गयी . वह अपने सुसराल से दो बार आंटी से मिलने आई सजी धजी मंजू का रंग रूप निखर आया था बच्चियां अपने पापा की ऊँगली पकड़े थीं .आंटी को ऐसा लगा जैसे संध्या के बाद अन्धेरा नहीं उजाला हो गया है .

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