वो लड़की.... रौद दी जाती है अस्मत जिसकी

27 जून 2015   |  डॉ. शिखा कौशिक   (316 बार पढ़ा जा चुका है)

वो लड़की


रौंद दी जाती है अस्मत जिसकी ,


करती है नफरत


अपने ही वजूद से


जिंदगी हो जाती है बदतर उसकी


मौत से .



वो लड़की


रौद दी जाती है अस्मत जिसकी ,


घिन्न आती है उसे


अपने ही जिस्म से ,


नहीं चाहती करना


अपनों का सामना ,


वहशियत की शिकार


बनकर लाचार


घबरा जाती है हल्की सी


आहट से .



वो लड़की


रौद दी जाती है अस्मत जिसकी


समझा नहीं पाती खुद को ,


संभल नहीं पाती


उबर नहीं पाती हादसे से ,


चीत्कार करती है उसकी आत्मा


चीथड़े -चीथड़े उड़ गए हो


जिसकी गरिमा के


जिए तो जिए कैसे ?





वो लड़की
रौद दी जाती है अस्मत जिसकी
घर से बहार निकलना
उसके लिए है मुश्किल
अब सबकी नज़रे
वस्त्रों में ढके उसके जिस्म पर
आकर जाती है टिक ,
समाज की कटारी नज़र
चीरने लगती है उसके पहने हुए वस्त्रों को ,
वो महसूस करती है खुद को
पूर्ण नग्न ,
छुटकारा नहीं मिलता उसे
म्रत्युपर्यन्त इस मानसिक दुराचार से .
वो लड़की
रौद दी जाती है अस्मत जिसकी ........

शिखा कौशिक 'नूतन '






अगला लेख: मानस के रचनाकार में भी पुरुष अहम् भारी



उषा श्रीवास्तव
28 दिसम्बर 2015

दिल को छू लेने वाली सशक्त रचना !

सार्थक रचना दिल को छू गयी .. बधाई

सार्थकता के धरातल पर आपका लेखन अत्यंत सराहनीय है ! तलवार से ज़्यादा ताक़तवर होती है क़लम...और इसी सत्यता पर हमें आगे बढ़ते जाना है। क़लम चल पड़ी है जिस बुराई के विरुद्ध, तो फिर उसे टिकने नहीं दिया है...रचना हेतु आभार !

निःशब्द कर देती हैं कुछ बातें...कितने ही अनसुलझे प्रश्नों के भंवर में डूबने लगते हैं हम...पर क़लम की भी सीमायें हैं ...एक अहम मुद्दे पर उत्कृष्ट रचना !

dhnyvad manjeet ji

आपकी रचना तमाचा है ऐसे ढोंगी लोगों के मुह पर जो किसी लड़की या स्त्री को हीं नज़रो से देखते हैं ... शाबाश शिखा जी ....

hardik dhnyvaad -ajay ji v aradhna ji .

aradhana
27 जून 2015

सुन्दर काव्य-धारा बहाने के लिए बधाई, कविता मर्मस्पेर्शी थी














शिखा जी आपकी रचना सदैव कोई न कोई चित्र छोड़ जाती है अच्छी रचना बधाई हो

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