मुक्तक

19 अगस्त 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (429 बार पढ़ा जा चुका है)

मुक्तक

जन्मा जिसने वह कोख धन्य ,
पाला जिसने वह माँ अनन्य,
जो मातृभूमि के लिए जिया-
उसकी पावन पद-रज प्रणम्य I

देश की माटी से जी भर प्यार हो,
कर सके हम गर्व वह किरदार हो,
चाहती है वीर भोग्या मात्र-भू-
देश का पुरुषार्थ पानीदार हो I

अपने हित जीना मात्र कर्म,
औरो हित जीना है सुकर्म,
होता है सब धर्मो से ऊपर,
धरती पर अपना राष्ट्रधर्म I

जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं,
करता माँ का अभिसार नहीं,
उसको उस माँ के आँचल मे,
है रहने का अधिकार नहीं ।

डॉ. उमाशंकर शुक्ल उमेश
फूलपुर प्रयागराज – २

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अतुलनीय मुक्तक

उषा यादव
19 अगस्त 2015

देश-प्रेम से ओत-प्रोत रचना पढ़कर अभिभूत हुई ! आपकी अन्य रचनाएँ भी अवश्य पढ़ना चाहूंगी I

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