मुट्ठी बांधकर

31 अगस्त 2015   |  अर्चना गंगवार   (419 बार पढ़ा जा चुका है)

जो मुट्ठी बांध के
एक उंगली के इशारे से
हमको चाँद दिखाते है
हम उनकी मुडी चार
उंगलियों में झांकते है
की
वो क्या है जिसके लिए
वो हमें बहलाते है .......

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dineshkumar
27 अक्तूबर 2017

wah

शुक्रिया ओम प्रकाश जी दो कदम रचना के साथ चलने के लिए

अति सुन्दर भावाभिव्यक्ति !

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13 सितम्बर 2015
13 सितम्बर 2015
चु
लोहे के टुकड़े पर छोटा सा चुम्बक एक ही दिशा में सौ बार रगडो लोहा भी चुम्बक बन जाता है क्योकि एक जैसे अणु पास पास आ जाते है फिर हर लोहा स्वम् खीचा आता है जो इंसान अपने विचार और कामो को एक ही दिशा में रगड़ते है वक़्त आने पर वो भी चुम्बक बन जाते है और लोग स्वंम खींचे चले आते है दशरथ मांझी भी इंसान ही तो
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