गुफ़्तगू

01 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (171 बार पढ़ा जा चुका है)

गुफ़्तगू

बे-बजह जिक्र ,तुम गुफ्तगू मत करो ,
जो मिले सो मिले ,आरज़ू मत करो ।

रहने दो इल्म को,अपने ईमान पर ,
इक हुनर है तो सौ, आरज़ू मत करो ।

वो जो अफ़साने ,अंजाम ना पा सकें,
कितना बेहतर हो,उनको शुरू मत करो ।

गर सलामत रहे ,आपका ज़र्फ़ यूं ,
तो रखो शौक से, रूबरू मत करो ।

काबिले गुफ्तगू उनको रहने भी दो ,
इस क़दर भी तो ,बे-आबरू मत करो ।

अगला लेख: समय



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
05 सितम्बर 2015
इस पिघलते ह्रदय में,है मिलन की आस कैसी ?बह रहा मन अश्रु बनके ,फिर नयन में प्यास कैसी?मौन मन उलझा उदासी की भवंर में अनवरत ,फिर है 'जुवां 'आहों की ,पदचाप ,कैसी ?कोई छेड़े स्वर, विरह की तान वीणा बेसुरी ,छटपटाती,व्यथित ,व्याकुल ,गूंजती आवाज कैसी ।फूल-कलियाँ रूठकर ,मंमुन्द एकाकी भ्रमर,गुनगुनाहट ,गुन्जनों
05 सितम्बर 2015
02 सितम्बर 2015
अतिक्रमण कर प्रेमपथ का ,छल गया विश्वास मेरा ।अब अंधेरों में भटकता ,फिर रहा एहसास मेरा ॥रिक्तता की प्यास बुझती, ना हृदय की वेदना ,त्रासदी अन्तःकरण की ,है क्षणिक उत्तेजना , कुंडली सी मारकर,बैठा है कोई पंथ घेरे ,कौन वह ?कर्तव्य पथ कर रहा उपहास मेरा ॥ अतिक्र
02 सितम्बर 2015
05 सितम्बर 2015
उठो !और दृढ़तर कसलो अपनी वीणा के तार,आदि -अंत से दिग-दिगंत तक ,दो स्वर को विस्तार ।मधुर-मधुर ध्वनि छेड़ ,तान ले ,राग आलाप,निराले ,साध सुरों की सरगम से,सारे संवेग जगा लो ;शब्द -संतुलन ,मधुर-मधुर सुर गूंजे शत-शत बार ॥उठो !और दृढ़तर कसलो अपनी वीणा के तार,आदि -अंत से दिग-दिगंत तक ,दो स्वर को विस्तार ।मुद
05 सितम्बर 2015
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x