प्रेमपथ पर है धुआं सा !

02 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (233 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रेमपथ पर है धुआं सा !

अतिक्रमण कर प्रेमपथ का ,छल गया विश्वास मेरा ।
अब अंधेरों में भटकता ,फिर रहा एहसास मेरा ॥

रिक्तता की प्यास बुझती, ना हृदय की वेदना ,
त्रासदी अन्तःकरण की ,है क्षणिक उत्तेजना ,
कुंडली सी मारकर,बैठा है कोई पंथ घेरे ,
कौन वह ?कर्तव्य पथ कर रहा उपहास मेरा ॥
अतिक्रमण कर प्रेमपथ का ,छल गया विश्वास मेरा ।
अब अंधेरों में भटकता ,फिर रहा एहसास मेरा ॥

रात के आस्तित्व में ज्यों दिन सिमट के रह गए ,
क्यों उजालों की परत से ,तम लिपट के रह गए ,
चल! हाथ में लेकर मशालें ,ढूंढने निकले 'अरुण'
मौन रजनी ना जनेगी ,कोख से अपनी सवेरा ॥
अतिक्रमण कर प्रेमपथ का ,छल गया विश्वास मेरा ।
अब अंधेरों में भटकता ,फिर रहा एहसास मेरा ॥


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कुंडली सी मारकर,बैठा है कोई पंथ घेरे ,
कौन वह ?कर्तव्य पथ कर रहा उपहास मेरा...अति सुन्दर, उत्कृष्ट रचना !

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