आईने पे धुंध सी है ज़िन्दगी!!

03 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (253 बार पढ़ा जा चुका है)

आईने पे धुंध सी  है ज़िन्दगी!!

साफ़ कर अपनी नज़र,अपना गिरेवाँ देखते हैं ,

 और  कितने लोग हैं ,जो अपना ईमां देखते हैं ।


ऐव अक्सर ढूँढना ,दस्तूर है अहले ज़माने का , 

खुदगर्ज हैं रिश्ते यहां सब अपना अरमाँ देखते हैं 


काश मिल जाये शकूंने दिल जूनून-ऐ-दौर में ,

इसलिए हम दर-बदर अपना नशेमां देखते हैं| 


 ख्वाब है या कोई हकीक़त कुछ समझ आता नहीं,

 अपने ही घर में मगर खुद को मेहमां देखते हैं ।


बहुत की कोशिश तुम्हे खुश रख सकूं मेरे अजीज , 

फिर भी हर इक दौर में ,तुमको परेशां देखते हैं । 

 

रूठकर वो दोस्त हमसे ,छुप गये जा ने कहाँ फिर,

 आजकल हर शक्ल में उनको  मेहरवाँ देखते हैं । 

 

वक़्त भी'अनुराग'क्या-क्या ,खेल दिखलाता रहा है,

 नक्श-ए-पॉ अपनी मुहब्बत के ,जहा-तहां देखते हैं |

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ख्वाब है क्या !क्या हकीक़त ,कुछ समझ आता नहीं,
जाने क्यों हम अपने घर में , खुद को मेहमां देखते हैं...लाजवाब !

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