है नशे में ज़िन्दगी !

03 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (217 बार पढ़ा जा चुका है)

है नशे में ज़िन्दगी !

चार सूं ज़िन्दगी का नशा छा रहा है ,
कोई हँसता है,रोता ,कोई गा रहा है|

उस मुसाफिर की,मंजिल हुई गुमशुदा,
रास्तों से मगर ,फिर भी टकरा रहा है ।

नक्शे-पां कल की ,पहचान होंगे,
वो अकेला ही ,इक कारवां जा रहा है ।

यूँ तो फुर्सत में देखा था चेहरा तेरा ,
हर घडी तू ,मेरे सामने आ रहा है ।

दास्ताँ आ गई, देखो अंजाम पर ,
कोई आगाज़ इसमें, नज़र आ रहा है ।

अंत में हमको ,तन्हाई ही क्यों मिली ,,
यूँ तो अक्सर ही महफिल से रिश्ता रहा है ।

हाय बिस्मिल ख़ुशी तुझको सजदा ,
मुद्दतों तुझपे ,हक सा रहा है ।

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दास्ताँ आ गई, देखो अंजाम पर ,
कोई आगाज़ इसमें, नज़र आ रहा है...शानदार !

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