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#व्यंग-लोकतंत्र से राजनीति का बढ़ता व्यापार?

04 सितम्बर 2015   |  Alok Kumar

क्या लोकतंत्र अलोकतन्त्र हो गया है सैकड़ों पंजीकृत राजनैतिक दल, जितने दल उतने विचारधारा क्या आज़ादी के बाद बांटो और राज करो के तहत इस सोच को देश की राजनीती में जगह दी गई थी या व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए पक्ष और विपक्ष की भूमिका लोकतंत्र में असरदार रहें इसकी वकालत थी?

क्यों लोकतंत्र के नाम पर आराजकता ही व्याप्त है चारो ओर लूट, खसोट घोटाला, चोरी डकैती, बलात्कार और न जाने क्या क्या, सत्ता में आने से पहले लोकतंत्र का राग सुहाता है जैसे धरना/प्रदर्शन करना हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार है मगर सत्ता मिल जानते के बाद इस सोच में तबदीली क्यों और कैसे आ जाती है?

लोकतंत्र का डीएनए अगर ख़राब है तो क्या तानाशाही (हिटलरगिरी) का डीएनए, लोकतंत्र के माध्यम से सत्ता मिल जाने के बाद भाता है? किसी भी व्यवस्था में/की खामियां उजागर तभी होती है जब उसको अपनाया जाता है तो क्या लोकतंत्र में जो खामियां है उसको दूर किया जाना चाहिए या चलता है चलता रहेगा वाला तकिया कलाम देश में लागु रहेगा?


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