"सत्य का आधार तुम हो"

05 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (225 बार पढ़ा जा चुका है)

"सत्य का आधार तुम  हो"

सत्य का आकार तुम हो ,सत्य का आधार तुम हो,
सृष्टि की संवेदना में ,शक्ति का संचार तुम हो ।

दृष्टी से झरती तुम्हारी ,सूर्य की नव रश्मीयाँ ,
तुम प्रकाशित तुमही प्रगति,उपहार तुम हो ।

आत्मा में धर्म ,मन ,वाणी ,ह्रदय में संहित ,
प्रेम की आराधना ,समृद्धि का उद्दगार तुम हो|

सत्य है अक्षय ,प्रगट होकर ,ना क्षय होता कभी,
द्रव्य की गरिमा में होता ,सत्य का श्रृंगार तुम हो ।

कल्प और विकल्प में ,हो सत्य एक यधार्थ मय ,
जीव का 'अनुराग'सत है ,सत्य का संसार तुम हो ।

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आत्मा में धर्म ,मन ,वाणी ,ह्रदय में संहित ,
प्रेम की आराधना ,समृद्धि का उद्दगार तुम हो...अति सुन्दर !


आत्मा में धर्म ,मन ,वाणी ,ह्रदय में संहित ,-----वाह सत्य --एकदम सत्य !

वर्तिका
05 सितम्बर 2015

"सृष्टि की संवेदना में ,शक्ति का संचार तुम हो" बहुत खूब!

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