"ये मिलन की प्यास कैसी "

05 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (638 बार पढ़ा जा चुका है)

"ये  मिलन की प्यास कैसी "

इस पिघलते ह्रदय में,है मिलन की आस कैसी ?
बह रहा मन अश्रु बनके ,फिर नयन में प्यास कैसी?

मौन मन उलझा उदासी की भवंर में अनवरत ,
फिर है 'जुवां 'आहों की ,पदचाप ,कैसी ?

कोई छेड़े स्वर, विरह की तान वीणा बेसुरी ,
छटपटाती,व्यथित ,व्याकुल ,गूंजती आवाज कैसी ।

फूल-कलियाँ रूठकर ,मंमुन्द एकाकी भ्रमर,
गुनगुनाहट ,गुन्जनों की हो गयी चुपचाप कैसी ?

चांदनी बिखरी धवल चादर ,धरातल की छटा ,
ठंडी-ठंडी वायु तन से, जहर रही है आग कैसी?

हैं सभी बंधन शिथिल ,बेबस प्रणय के ग्गेत हैं ,
चकित उन्मादित लहर में ,जग रही है रात कैसी ?

मन मुकुर में भी वही प्रतिबिम्ब ,मानहु शेष हैं ,
ये है ह्रदय की व्यक्तिगत ,बुनुयाद कैसी ।

भाव सहमे और मन की भावना भयभीत है ,
शशीकला की छवि छटा ,चितकी हुई है उदास कैसी ?

घोर तम,घनघोर तम ,घनश्याम मय ,घन-दामिनी ,
कोयलों की कूंक कटु ,काक वाक् मिठास कैसी ?



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घोर तम,घनघोर तम ,घनश्याम मय ,घन-दामिनी, कोयलों की कूंक कटु ,काक वाक् मिठास कैसी? सुर-लय-ताल की अनुपम छटा बिखेरती पंक्तियाँ !

घोर तम,घनघोर तम ,घनश्याम मय ,घन-दामिनी ,
कोयलों की कूंक कटु ,काक वाक् मिठास कैसी ?

क्या बात है --इकीस्वीं सदी का छायावाद

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