मंथन

05 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (186 बार पढ़ा जा चुका है)

मंथन

होगा हृदय मंथन ,मगर विश्वास चाहिए,
ज्यों अंधकार के लिए,प्रकाश चाहिए ।

संभव है नई सृष्टि का,निर्माण तो मगर ,
कल्पनाओं को खुला, आकाश चाहिए ।

दृष्टि-दृष्टि के विभिन्न ,दृष्टिकोण हैं ,
दृश्य को अदृश्य का ,एहसास चाहिए ।

संवेदना करेगी,सूक्ष्मता से निरिक्षण ,
प्रस्तुत तो आदि -अंत का इतिहास चाहिए ।

ये दौर मरुस्थल की तरह, जल रहा है दोस्त,
क्यों पूछते हो इसको,कितनी प्यास चाहिए ।

पहचान सभ्यता की,आज भी है गुमशुदा ,
'अनुराग' मनुजता को ,नया ग्रास चाहिए |

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दृष्टि-दृष्टि के विभिन्न ,दृष्टिकोण हैं ,
दृश्य को अदृश्य का ,एहसास चाहिए.....मनहर-मनोग्य शब्द संयोजन !

संभव है नई सृष्टि का,निर्माण तो मगर ,
कल्पनाओं को खुला, आकाश चाहिए । -----उत्तम --बाकई पहरे में तो दम ही घुट सकता है |

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