"मन की वीणा के तार "

05 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (518 बार पढ़ा जा चुका है)

"मन की वीणा के तार "

उठो !और दृढ़तर कसलो अपनी वीणा के तार,
आदि -अंत से दिग-दिगंत तक ,दो स्वर को विस्तार ।

मधुर-मधुर ध्वनि छेड़ ,तान ले ,राग आलाप,निराले ,
साध सुरों की सरगम से,सारे संवेग जगा लो ;
शब्द -संतुलन ,मधुर-मधुर सुर गूंजे शत-शत बार ॥

उठो !और दृढ़तर कसलो अपनी वीणा के तार,
आदि -अंत से दिग-दिगंत तक ,दो स्वर को विस्तार ।

मुदित -माधुरी ,रूप मनोहर ,ज्योतिष्ना मनुहार ,
शुचिता स्वर सुन ,जाग-जाग, नव उत्त्कर्षों के द्वार,
नवल सृजन पुष्पहार बन,दे-दे ,दे उपहार ।

उठो !और दृढ़तर कसलो अपनी वीणा के तार,
आदि -अंत से दिग-दिगंत तक ,दो स्वर को विस्तार ।

द्वेष,राग,तम बेध ,वेद, विदित- विज्ञान प्रचारो
कर्म-यज्ञ ,श्रुति ,संकल्पों के मंत्र उच्चारो ,
गीत,प्रीती,संगीत,रीति मय ,रच अद्दभुत संसार

उठो !और दृढ़तर कसलो अपनी वीणा के तार,
आदि -अंत से दिग-दिगंत तक ,दो स्वर को विस्तार ।

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उत्कृष्ट रचना !

मधुर-मधुर ध्वनि छेड़ ,तान ले ,राग आलाप,निराले , -------सुन्दर ----सुन्दर शब्द-लेखन !

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