"हो गए बागी सवाल"

11 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (135 बार पढ़ा जा चुका है)

"हो गए बागी सवाल"

वो लोग वतन बेच के,खुशहाल हो गए,
वाशिंदा मेरे मुल्क के,कंगाल हो गए ।

रखना पडा है गिरवी ,आबरू-ईमान को,
बच्चे हमारे भूख से ,बेहाल हो गए ।

रोटी की भूख कम थी ,चारा भी खा गए,
सत्ता में सियासत के,जो दलाल हो गए ।

है मुल्क तरक्की के, दौर-ए-सफ़र में यारो,
कई राम-औ -रहीम के,बिकवाल हो गए ।

लौ कंपकपा रही है,अरमान चिरागों के ,
बड़े शख्त आंधियों के,इकवाल हो गए ।

इक उम्र खर्च की है,इस घर को बनाने में ,
टुकड़ों में बंट गया है, बुरे हाल हो गए ।

'अनुराग'चाहिए अब,वाजिव जवाब हमको,
चुप रहते-रहते देखो ,बागी सबाल हो गए ।

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