समय

12 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (138 बार पढ़ा जा चुका है)

समय वो तलवार है जिसे कोई नहीं हासिल कर सका,
समय वो ताकत है जिसे कोई नही रोक सका,
समय से आजतक कोई नही बच सका लगता है ,
लगता है हम समय को काट रहे हैं ,
पर सच तो है की समय हमे काट रहा है,
समय वो ज़ंजीर है जिसे कोई नही तोड़ सका,
समय वो चीज है जिसे भागवान नही रोक सका ।

'कृष्णा' ! ये पंक्तींया मेरे ९ बर्षीय पुत्र की स्व-अभिव्यक्ति है !

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होगा हृदय मंथन ,मगर विश्वास चाहिए,ज्यों अंधकार के लिए,प्रकाश चाहिए ।संभव है नई सृष्टि का,निर्माण तो मगर ,कल्पनाओं को खुला, आकाश चाहिए ।दृष्टि-दृष्टि के विभिन्न ,दृष्टिकोण हैं ,दृश्य को अदृश्य का ,एहसास चाहिए । संवेदना करेगी,सूक्ष्मता से निरिक्षण ,प्रस्तुत तो आदि -अंत का इतिहास चाहिए ।ये दौर मरुस्थल
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