ग़ज़ल -बीते लम्हें

13 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (322 बार पढ़ा जा चुका है)

ग़ज़ल -बीते लम्हें

आने वाला वक्त अगर, दोहराएगा बीते लम्हें ,
उन्हें पकड़ के रख लूंगा ,जो छूट गए पीछे लम्हें ।

रफ्ता-रफ्ता उमींदों की, चादर जब बुन जायेगी ,
थोडा रूककर के सुस्तायेंगे ,यादों के मीठे लम्हें ।

माँ की उंगली पकड़ ठुमक कर ,चला करेंगे इतराके ,
आयेंगे कल बचपन की ,चंचलता के नीचे लम्हें ।

अभी वक्त है ठहर जरा तू,बतिया ले मन की बातें ,
ना जाने फिर चुप्पी ओढ़े ,आ जाएँ पीछे लम्हें ।

नवयोवन की भाषा सचमुच ,इतनी ज्यादा बदल गई ,
समझ नहीं पाते माँ-बाबा ,बच्चों के खीचे लम्हें ।

नैतिकता औ संस्कार को ,निगल रहा है परिवर्तन ,
हमने जो अरमानो से ,जी भर कर के सींचे लम्हें ।

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आदरणीय अर्चना जी आपकी सकारात्मक प्रितिक्रिया हमारा उत्त्साह बढ़ातीं है ,धन्यवाद!

अर्चना गंगवार
31 अक्तूबर 2015

आने वाला वक्त अगर, दोहराएगा बीते लम्हें ,
उन्हें पकड़ के रख लूंगा ,जो छूट गए पीछे लम्हें ।

बहुत खूब कहा है

शर्माजी बहुत-बहुत धन्यवाद ,आपका प्रोत्साहन ,विचारों को संजीवनी प्रदान करता है !

नैतिकता औ संस्कार को ,निगल रहा है परिवर्तन , हमने जो अरमानो से ,जी भर कर के सींचे लम्हें... बहुत सुन्दर रचना !

माँ की उंगली पकड़ ठुमक कर ,चला करेंगे इतराके ,
आयेंगे कल बचपन की ,चंचलता के नीचे लम्हें । --- सुन्दर । कोमल भावों का चित्रांकन !

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