अभी शेष हैं बात

14 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (280 बार पढ़ा जा चुका है)

अभी शेष हैं बात

अभी शेष है निशा चलो !कुछ देर मचल कर रात गुजारें ।

पूछ चुके हैं जाकर दर -दर ,
ढूंढ रहे थे जिनको घर-घर,
थी जिनकी अभिलाषा मन को ,
जहाँ झुके थे प्रणय नमन को ,
आज वो ही आये हैं अपनी, परिभाषा लेकर मेरे द्वारे ।
अभी शेष है निशा चलो !कुछ देर मचल कर रात गुजारें ।

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