चिराग़

15 सितम्बर 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (156 बार पढ़ा जा चुका है)

चिराग़

तेरी रहमत से जी रहे हैं
परिधि में रहकर
चिरागों से ज़रा पूछ
अपनी मर्ज़ी से
न वे जलते हैं
और न बुझते हैं ।
उनकी जलती हुई
लौ को देखो
अपने पास न
वे कुछ रखते हैं ।
लाल अग्नि में जलकर
ख़ामोश हो जाते हैं
रौशनी किसको मिली
वे नहीं पूछते
अंधेरों में कौन खो गए
वे नहीं जानते
उनकी फितरत थी जलना
वे जलते रहे,
उनका काम था राह दिखाना
वे दिखाते रहे...

-जय वर्मा
jaiverma777@yahoo.co.uk

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अलिप्त मन को चिरागों की संज्ञा देकर बहुत ही अच्छा वर्णन ।. बहुत बहुत बधाइयाँ

अर्चना गंगवार
15 सितम्बर 2015

उनकी फितरत थी जलना
वे जलते रहे,
उनका काम था राह दिखाना
वे दिखाते रहे...

हम इंसान ऐसे कहा सोचते ।......सत्य कहा

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