सुबह की धूप

15 सितम्बर 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (262 बार पढ़ा जा चुका है)

सुबह की धूप

प्रेम करने के लिए
गढ़ने को
अपने ही वायदे
और पैमाने
ताकि बिना किसी के
सपनों को लांघे
अपने सपनों को
सजाने की जगह मिल जाए ।

-डॉ. वीणा सिन्हा (एम्.डी.)
ई-१०४/५, शिवाजी नगर, भोपाल ।

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