कोई बेचैन है

15 सितम्बर 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (272 बार पढ़ा जा चुका है)

कोई बेचैन है

हम कोई बना सकते नहीं ज़मीन का टुकड़ा
चमका कभी सकते नहीं मुकद्दर किसी का ।

सुन्दर फूलों और कलियों को जिसने है बनाया
कहीं ओझल रहता है वह दुनिया बनाने वाला ।

कोई बेचैन है समंदर सा ज़िन्दगी की दौड़ में
दे रहे हैं इम्तिहान सरासर अंधेरों के मोड़ में ।

बने हैं मिट्टी के घरोंदे बारिशों के शहर में
पलट रहे हैं पन्ने हरेक हसरतों के ढेर में ।

गुल खिलने से पहले रंगों को न देख सके,
मुसाफिर हैं ज़िन्दगी के राज़ न जान सके ।

अजब सी दास्ताँ है जौहरी ढूंढता है मोती,
शीशे की बनी हुई नहर के बहते पानी में ।

अमीर और ग़रीब सब बने हैं मिट्टी के सदा,
जीने का अधिकार है किसी को कम न ज़्यादा ।

-जय वर्मा
jaiverma777@yahoo.co.uk

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