साग़र

15 सितम्बर 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (238 बार पढ़ा जा चुका है)

साग़र


दिन भर की थकन मिटाने के लिए
साग़र जब लेता है अंगड़ाई
शब् के अँधेरे में तारों की छाँव में
लहरें फैलाती किनारों तक अपना दामन
किसी को मिलता है उल्फ़त का खज़ाना,
किसी के हिस्से में आती है ग़म-ए-तन्हाई ।

"लोग पारस तलाश करते फिरते हैं,
भूल जाते हैं कि पारस तो वे खुद ही होते हैं ।"

-जय वर्मा
jaiverma777@yahoo.co.uk

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