दर्दे दिल की दास्ताँ

16 सितम्बर 2015   |  पुष्पा पी. परजिया   (764 बार पढ़ा जा चुका है)

दर्दे दिल की दास्ताँ

तकते रहे राहें हम उम्र के हर मोड़ पर
उम्मीद का छोड़ा न दामन क़यामत की दस्तक होने तक
मुस्कान सजाये होठों पर हम जीते गए अंतिम आह तक
सोचा कभी मिल जाय शायद कहीं खुशियों का आशियाँ हमें भी
पर थे नादान हम कि न समझ सके बेवफा ज़माने के सितम आज तक
अंतिम मोड़ पर पता चला कोई नहीं अपना यहाँ
हम तो इक मेहमान थे सबके लिए बस आज तक
कितने नादाँ थे न समझ सके अपनों की फ़ितरत को
कितने नादाँ थे न समझ सके बेगानों की मतलब परस्ती को
हमे तो हर पल का मुस्कुराना पड़ गया भारी यहाँ
सबने भुला दिया ये कहकर कि हम तो अकेले में भी मुस्कुरा लेते हैं
दर्दे दिल की दास्ताँ न सुना ए दिल! किसी को
ये बस्ती है जहाँ इंसा के दिल पत्थर के होते हैं.

अगला लेख: जय श्री गणेश



अंकित
10 फरवरी 2016

बहुत बढ़िया | मुझे तो मज़ा आ गया आज ये पढ़के |

बहुत बहुत धन्यवाद नरेंद्र भाई जी .......माफ़ी चाहती हु देर से रिप्लाई ke लिए

नरेंद्र जानी
23 नवम्बर 2015

बहुत सुंदर रचना.

बहुत बहुत धन्यवाद योगिता जी . . . . . .

हार्दिक आभार सह धन्यवाद मनोज कुमार पाण्डेय जी ।.

उम्दा......... बेहतरीन

ये बस्ती हैं जहाँ इंसा के दिल पत्थर के होते हैं ।… बहुत ही सुंदर रचना

हतोत्साहित लेखक चला रहे पुरस्कार वापसी अभियान ‪#‎LNN‬
click http://newskranti.com/?p=7450

इस रचना को पसंद करने के लिए सहिर्दय आभार अवधेश जी ,। बहुत बहुत धन्यवाद

मुस्कान सजाये होठों पर हम जीते गए अंतिम आह तक! बहुत सुन्दर रचना पुष्पा जी!

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