दहेज दानव

19 सितम्बर 2015   |  राघवेन्द्र कुमार   (213 बार पढ़ा जा चुका है)


कब तक अपनी बहू बेटियाँ
चढ़ती रहेंगी बलिवेदी पर ।
इस दहेज दानव के मुख का
कब तक रहें निवाला बनकर ।
कब तक इनके पैरों में
जकड़ी रहेंगी बेड़ियाँ ।
कब तक हम सब हाथों में
पहने रहेंगे चूड़ियाँ ।
कब तक भ्रष्ट समाज के आगे
अपनी इज़्जत नतमस्तक होगी ।
कब तक धन लोलुपता के आगे
नर्क ज़िन्दगी त्रिया की होगी ।
इस दहेजने आज सभी को
नेत्रहीन कर डाला है ।
खिली हुई नवकलिका को
पैरों तले कुचल डाला है ।
क्रय विक्रय इंसानो का
अपराध बड़ा कानून बताता ।
पर विवाह में यह दहेज
दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जाता ।
इस समाज के कर्ता धर्ता
सब दहेज के लोभी हैं ।
ऊपर नीचे इस समाज में
सब ही सुविधा भोगी हैं ।
इस दहेज ने अब समाज में
गहरी जड़े बिठा ली हैं ।
हर सफेद पर्दे के पीछे
मन की मूर्ति काली है ।
दूर भगाओ इस दहेज को
यदि तुम में मानवता है ।
ये व्याधि प्राण हरने वाली
ये प्रथा नहीं कुत्सितता है ।
क्यों दहेज के लिए किसी का
जीवन तबाह करते हो ?
क्यों दहेज दानव को
घर में शुमार करते हो ।
मार भगाओ इस दानव को
करो प्रयास सभी मिलकर ।
अब और न कोई जले मरे
इस दहेज की आग में जलकर ।।

अगला लेख: धन लोलुपता



पवन कुमार पान्डेय भाई हौसला बढ़ाने के लिए आभार...

आपकी बेहतरीन रचना सो देश से दहेज़ को उखाण फेकना

धन्यवाद प्रवेन्द्र जी...

सोचने योग्य है . ये बात लेकिन लोगो की आँखों पर तो दौलत की पट्टी छड़ी है.

आभार मित्रवरों...

वर्तिका
19 सितम्बर 2015

सुंदर रचना! युवा पीढ़ी आगे आये तो दहेज रूपी दानव को जड़ से उखाड़ फेक सकती है।

मार भगाओ इस दानव को
करो प्रयास सभी मिलकर....सार्थक रचना !

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