"घुल जाऊँगा हवाओं में"

20 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (241 बार पढ़ा जा चुका है)

"घुल जाऊँगा हवाओं में"

मुझको महफूज़ रख, निगाहों में ,
वरना घुल जाऊँगा, हवाओं में ।

गर मेरा हाथ ,तुमने छोड़ दिया,
ढूंढ ना पाओगे , दिशाओं में|

प्रेम-धागों को, यूँ ना तोड़ो यारो,
जोड़ दें वो दम नहीं,दवाओं में |

तुम जो छू लो ,तो सकूँ आये,
याद रख्खुँगा मैं, दुआओं में|

दिल में जज्वात ,कुछ संजो लेना ,
सिर्फ लुटना नहीं,अदाओं में ।


"हो गए बागी सवाल"

वो लोग वतन बेच के,खुशहाल हो गए,
वाशिंदा मेरे मुल्क के,कंगाल हो गए ।
रखना पडा है गिरवी ,आबरू-ईमान को,
बच्चे हमारे भूख से ,बेहाल हो गए ।
रोटी की भूख कम थी ,चारा भी खा गए,
सत्ता में सियासत के,जो दलाल हो गए ।
है मुल्क तरक्की के, दौर-ए-सफ़र में यारो,
कई राम-औ -रहीम के,बिकवाल हो गए ।
लौ कंपकपा रही है,अरमान चिरागों के ,
बड़े शख्त आंधियों के,इकवाल हो गए ।
इक उम्र खर्च की है,इस घर को बनाने में ,
टुकड़ों में बंट गया है, क्या हाल हो गए ।
'अनुराग'चाहिए अब,वाजिव जवाब हमको,
चुप रहते-रहते देखो ,बागी सबाल हो गए ।

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धन्यवाद अनुराग जी

तुम जो छू लो ,तो सकूँ आये,
याद रख्खुँगा मैं, दुआओं में|

सुंदर अभिव्यक्ति !

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