तू पथिक है !

24 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (647 बार पढ़ा जा चुका है)

तू पथिक है !

पथिक !
हम सब पथिक हैं,
हमारी अनवरत यात्रा,
पड़ाव कम ,
अतुलनीय !जीवन अनंत,
निरंतर अग्रसर है ,
कर्मपथ पर ,
ना रुकता और ना थकता कभी,
विदित है सबको,
सभी की मंज़िले भी एक हैं ,
किसी को मिल गई !
गर्वित !!
ह्रदय हर्षित निरंतर बढ़ रहा है,
कठिन....उन्नत!
समय की सीढीयाँ वो ,
पथिक !
पथिक तो वो भी हैं ,
जो राह की ठंडी हवा में,
थकित ,आलस्य से तर ,
सो गए हैं,
अकेले हो गए हैं,
नियत है पर,
मिलेगी उनको भी मंजिल ,
अरे! जागो ,
उठो ,आगे बढ़ो ,
तुम्हें तो कर्म करना है,
गिरे तो हो,
संभलना है,
तुम्हारा धर्म है संघर्ष ,
कर !
दिशाओं से,हवाओं से ,
समय से,
और समय की योजनाओं से,
तू उठ फिर देख,
उस उगते हुए जीवन से ,
तेरा संघर्ष है,
दरअसल,
उस बुझते हुए सूरज के साथ,
तुझे मालुम है ना ,
तू पथिक है !!

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उत्कृष्ट रचना !

विदित है सबको,
सभी की मंज़िले भी एक हैं ,
किसी को मिल गई !
गर्वित !!
ह्रदय हर्षित निरंतर बढ़ रहा है,
कठिन....उन्नत!
समय की सीढीयाँ वो ,
पथिक ! उपयुक्त ,सबल ,प्रायोगिक कविता !

महेश नेमानी
28 सितम्बर 2015

हमारी अनवरत यात्रा,
पड़ाव कम ,
अतुलनीय !जीवन अनंत,
निरंतर अग्रसर है , वाकई !सुन्दर गहरी सोच !

हमें में तो आपके शब्दों से ऊर्जा प्राप्त होती है ,वर्तिका जी प्रोत्साहित करने के लिए धन्यवाद !

प्रियंका जी ह्रदय से आपका आभार ,आपके शब्दों से मैं अनायास ही गौरवाम्वित प्रतीत करता हूँ धन्यवाद !

वर्तिका
24 सितम्बर 2015

"ना रुकता और ना थकता कभी... ह्रदय हर्षित निरंतर बढ़ रहा है, कठिन....उन्नत!"उत्कृष्ट रचना साझा करने के लिए बधाई! आपकी प्रत्येक रचना प्रेरित करती हैं!

प्रियंका शर्मा
24 सितम्बर 2015

आज बहुत गहरी रचा आई है ।.. हम सब रोज़ ही संघर्ष करते हैं ।..

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