बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं

25 सितम्बर 2015   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (281 बार पढ़ा जा चुका है)

बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं

बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं,
और नदियों के किनारे घर बने हैं ।

चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर,
इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं ।

इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं हैं,
जिस तरह टूटे हुए ये आइने हैं ।

आपके कालीन देखेंगे किसी दिन,
इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं ।

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,
हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं ।

अब तड़पती-सी गजल कोई सुनाए,
हमसफर ऊँघे हुए हैं, अनमने हैं ।

दुष्यंत कुमार त्यागी

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प्रियंका शर्मा
25 सितम्बर 2015

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,
हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं । भाव विभोर कर दे ऐसी रचनाएँ

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