" फूलों से"

27 सितम्बर 2015   |  पुष्पा पी. परजिया   (286 बार पढ़ा जा चुका है)

" फूलों से"

कहीं तू सजता शादी के मंडप में
कहीं तू रचता दुलहन की मेहंदी में
कहीं सजता तू द्दुल्हे के सेहरे में
कहीं बन जाता तू शुभकामनाओं का प्रतिक
तो कहीं तुझे देख खिल उठती तक़दीर
कहीं कोई इजहारे मुहब्बत करता ज़रिये से तेरे
तो कहीं कोई खुश हो जाता मजारे चादर बनाकर
कहीं तेरे रंग से रंग भर जाता महफ़िलों में
तो कहीं तू सुखकर बीती यादें वापस ले आता
जब पड़ा होता बरसो किताबों के पन्नो में
सूखने के बाद भी हर दास्ताँ ताज़ा कर जाता
. तुझे देख याद आजाता किसी को अपना प्यारा सा बचपन
तो कहीं तेरी कलियाँ दिखला देतीं खुशबुओं के मंजर
कभी तो तू भी रोता तो होगा क्यूंकि,
जब भगवन पर तू चढ़ाया जाने वाला,
कभी मुर्दे पर माला बनकर सजता होगा
शायद फूलों को बनाकर ईशवर ने इंसा को,
दिया सन्देश" ये " जीवन में हर पल न देना,
साथ सिर्फ खुशियों का तुम
लगा लेना ग़म को भी कभी गले से और ,
किसी दुखियों के काम आ जाना
जैसे फुल कहीं भी जाये
काँटों में रहकर भी वो हरपल मुस्कुराये ,हर पल मुस्कुराये
यहाँ तक की, जब बिछड़े वो अपने पेढ से फिर भी वो ओरो की शोभा बढ़ाये
सदा मुस्कुराये इंसा के मन को भाये ..

अगला लेख: जय श्री गणेश



सुन्दर शब्दों से इस रचना को नवाज़ कर आपने मुझे जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए हार्दिक आभार सह धन्यवाद ओम प्रकाश शर्मा जी ।

ऐसी सुन्दर रचनाओं के माध्यम से कितने ही शब्द भी पुष्पित-पल्लवित-सुरभित हो जाते हैं ! मनहर-मनोग्य-रुचिर रचना !

इस रचना को पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद योगिता जी ...

सुन्दर रचना!

इस कविता की सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद शब्द नगरी संगठन . .

शब्दनगरी संगठन
28 सितम्बर 2015

अति उत्तम

कविता को पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार वर्तिका जी ।

वर्तिका
28 सितम्बर 2015

फूलों के माध्यम से, जीवन के विभिन्न पहलुओं को बखूबी से दर्शाया हैं! धन्यवाद!

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