सरहद

10 अक्तूबर 2015   |  अर्चना गंगवार   (84 बार पढ़ा जा चुका है)

( दो देशो के मुखिया अपने घरो में सुरक्षित बैठ कर लड़ते है ......लेकिन  उनकी सजा बेगुनाओ को मिलती है  )

सरहद के इस पार

सरहद के उस पार

पर

सरहदों से दूर

वो लड़ रहे है

लड़ लड़ कर

छुप रहे है

छुप छुप कर

लड़ रहे है

 

नहीं उन्हें मौत का

खौफ

उनकी जगह

कोई और

मर रहे है

वे बेख़ौफ़

घूम रहे है

 

सरहद के इधर

सरहद के उधर  ( रहने वाले )

लड़ नहीं रहे

फिर भी मर रहे है……..

कभी खौफ से

कभी गोली से

ये सरहद से

अपनी

खता पूछ रहे है.

 

 

अगला लेख: आधे कपड़ो में पूरी लड़की.........



बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति. रूठे हुए शब्दों की जीवंत भावनाएं. सुन्दर चित्रांकन
पोस्ट दिल को छू गयी.कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..
कभी इधर भी पधारें
https://www.facebook.com/MadanMohanSaxena

अर्चना गंगवार
25 अक्तूबर 2015

आशीष जी ।..vijay जी आभार आपका

अर्चना गंगवार
25 अक्तूबर 2015

वर्तिका जी रचना को आपका साथ मिला ।......bahut धन्यवाद

महत्वाकांशा किसी की और परिणाम भुगतें दूसरे यह सिलसिला तो सदियों से चला आ रहा है

आशीष बिष्ट
14 अक्तूबर 2015

लय

वर्तिका
14 अक्तूबर 2015

"सरहद के इधर, सरहद के उधर ( रहने वाले )
लड़ नहीं रहे, फिर भी मर रहे है……।" बिल्कुल सत्य कहा आपने! उत्कृष्ठ भावाभिव्यक्ति!

अर्चना गंगवार
13 अक्तूबर 2015

पुष्प जी रचना के भाव पर अपने विचारो को साझा करने का सुक्र्रिया

अर्चना गंगवार
13 अक्तूबर 2015

महातम मिश्रा जी बहुत बहुत सुक्र्रिया

सरहद पर अलविदा कहकर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले देश के हरेक सैनिक को हमारा हार्दिक सम्मान सह शत शत नमन , साथ उनके परिवार को भी शत शत वंदन .... शहीदों की सहादत की बहुत खूब सूरत रचना .

महातम मिश्रा
11 अक्तूबर 2015

उन्नत भाव आदरणीया जी

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