कुर्सी पर दावा करने वालों के लिए भाजपा में नहीं जगह!

10 अक्तूबर 2015   |  गिरिजा नन्द झा   (164 बार पढ़ा जा चुका है)

गिरिजा नंद झा

रामविलास पासवान अपने मियां मिट्ठू बने हुए हैं। गिरिराज सिंह जरूरत से ज़्यादा लोगों का ज्ञान-विज्ञान बढ़ाने में जुटे हैं। दैनिक आधार पर ट्वीट करने में वे जितना शब्द खर्च कर रहे हैं उतने तो उन्होंने शिक्षण काल में प्रश्नों का उत्तर लिखने में शब्दों को खर्च नहीं किया होगा। रविशंकर प्रसाद खामोशी से भाजपा की राजनीति को समझने की कोशिश कर रहे हैं। सुशील मोदी को समझ में नहीं आ रहा है कि जिस तरह की समस्याएं विकट होती जा रही है, उसमें खुद को साबित करें तो कैसे करें? जीतन राम मांझी अपने अनुभवों का लाभ उठाना चाहते हैं। उनका तर्जुबा काबिलेतारीफ है। जिस नीतिश कुमार ने उन्हें बिहार की राजगद्दी सौंपी थी, उन्हें ही उन्होंने पानी पिला दिया। कुर्सी पर हक़ साबित करने के मामले में उनका दावा सबसे प्रखर भी है और मजबूत भी। मगर, जिन्हें भाजपा की मौजूदा भीतरी राजनीति की समझ है, वे जानते हैं कि इनमें से किसी को बिहार के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी नहीं सौंपी जानी है। 


यह हालत तब है जब भाजपा को अपनी जीत का भरोसा तक नहीं है। जिस तरह से लोगों के रूझान सामने आ रहे हैं और जिस तरह से भाजपा नेताओं में अफरातफरी का माहौल है, उससे तो यही साबित होता है। जो सबूत भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन के पक्ष में भी पेश किए जा रहे हैं, उसके मुताबिक बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतिश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को, लोकप्रियता के मामले में पटखनी देते नज़र आ रहे हैं। हालांकि, सारे सबूतों और गवाहों के आधार पर भी दावा यह किया जा रहा है कि भाजपा बिना किसी झंझट के यह चुनाव जीत रही है। अब यह कमाल कैसे हो सकता है कि नीतिश कुमार को पसंद करने वालों की संख्या 68 प्रतिशत है, बावजूद वे चुनाव हार जाएंगे और भाजपा 58 प्रतिशत की लोकप्रियता हासिल करने के बाद भी चुनाव जीत जाएगी। तथ्यों को समझने और समझाने के लिए सभी के अपने-अपने अंकगणित और तर्कशास्त्र हैं। 


अगर, भीड़ को प्रमाणिक माना जाय तो भाजपा यह चुनाव जीत रही है। मगर, भीड़ जीत का प्रमाण ना पहले रहा है, न अब है और ना आगे रहेगा। भीड़ छिटकना, हार का संकेत जरूर है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में जिस तरह से मतदाताओं ने राहुल गांधी या फिर कांग्रेस के किसी भी नेता को सुनने से मना कर जिस तरह का संकेत दिया था, उससे इसके प्रमाणिक होने में कोई संशय नहीं रह गया है। रही बात भीड़ से जीत की पुष्टि की तो जिन लोगों ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की रैली को देखा है, वे इस तथ्य पर यकीन कर सकते हैं। वाजपेयी की रैली ही क्यों, दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी की रैली में भी भीड़ कभी कम नहीं हुई। उस दौरान, लोग उन्हें समझने की कोशिश कर रहे थे मगर, वे उन्हें समझा नहीं पाए। दिल्ली में भाजपा के साथ किस तरह का व्यवहार भीड़ ने दिखाया, उसे भाजपा याद कर और ज़्यादा दुखी नहीं होना चाहती। 


मगर, यहां पर विषय हार-जीत पर नहीं है। विषय यह है कि अगर भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए को जीत हासिल होती है तो बिहार की राजगद्दी किसे सौंपी जाएगी? रामविलास पासवान के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उन्हें इस लायक माना था, इस लिहाज़ से कुर्सी पर उनका हक़ बनता है। ठीक वैसे ही, जैसे पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अटल बिहारी वाजपेयी में देश का भविष्य देखा था और देर से ही सही, वे देश के प्रधानमंत्री बने। बने की नहीं? इसके अलावा भाजपा दलित को बिहार की कुर्सी सौंपना चाहती है और पासवान दलितों के ‘मसीहा’ हैं। तो क्या जीतन राम मांझी, एनडीए में घास छिलने के आए हैं! वे भी दलित हैं और उनके पास तो बिहार में नीतिश कुमार जैसे मंझे हुए नेता को धूल चटाने का अनुभव है। उनका दावा कमजोर कैसे हो गया? बरसों बाद बिहार में जीत की आस लगाए बैठे भाजपा नेताओं की दावेदारी को कैसे खारिज़ किया जा सकता है। गिरिराज किशोर जिस तरह मोदी की तर्ज पर ‘टेक्नोक्रेट’ हुए जा रहे हैं, जिस तरह से अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगल रहे हैं, वह कोई सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए तो नहीं कर रहे। प्रधानमंत्री मोदी के लिए तो लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अल्पसंख्यकों के बारे मंे सिर्फ इतना ही तो कहा था कि जिन्हें मोदी जी से परेशानी हों, वह पाकिस्तान चले जाएं-आज वे केंद्र सरकार में मंत्री होने का सुख भोग रहे हैं। 


रविशंकर प्रसाद मन ही मन गुदगुदा रहे हैं। पढ़े-लिखे होने का मुखौटा ओढ़े हुए हैं और उनका विश्वास इस बात में है कि जब सारे लोग आपस में लड़ झगड़ कर थक जाएंगे, खामोशी से मोदी जी के पास जाएंगे और आशीर्वाद ले कर वापस लौट जाएंगे। जिस तरह से वे प्रधानमंत्री मोदी के साथ मोदी जी लगाने की वकालत करते रहे हैं, उससे उनके हिंदी ज्ञान और मोदी जी के प्रति उनकी कृतज्ञता को समझा जा सकता है। इन सबों के बीच की दावेदारी में सबसे कमजोर और निरीह हालत सुशील मोदी की है जिनके पास प्रधानमंत्री मोदी के उपनाम के सिवा ऐसी कोई समानता नहीं है जो उन्हें उन तक पहुंचा सके। मगर, अभी तो नतीजा आना ही बाकी है। जीत के अनिश्चिय की स्थिति से बाहर निकलने की ही ‘टेंशन’ है। अगर, संयोग से जीत मनमुताबिक मिल जाएगी तो फिर मुख्यमंत्री दूसरों की महत्वाकांक्षा और मर्जी से कैसे तय होगा? समझने वाली बात है या नहीं! 


अगला लेख: क्या दिल्ली की गलती को बिहार में दोहरा रही भाजपा?



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x