भूख से मरने वालों का सच नहीं जानते हम

15 अक्तूबर 2015   |  गिरिजा नन्द झा   (280 बार पढ़ा जा चुका है)

गिरिजा नंद झा

हालांकि, इस तथ्य को जानने में अपनी कोई दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए, लेकिन सामान्य ज्ञान बढ़ाना हो तो इस पर एक नज़र डालने में कोई हजऱ् नहीं है। बहुत बड़ा आंकड़ा नहीं है और इसीलिए इसे याद रखने के लिए बहुत ज़्यादा माथापच्ची भी नहीं करनी होगी। तथ्य यह है कि मौत अब तक का आखिरी सच है और इस सच के साथ एक सच यह भी है कि सिर्फ भूख से मरने वालों की तादाद 58 प्रतिशत है। यानी आधी से अधिक आबादी भरपेट भोजन नहीं मिलने की वज़ह से असमय काल का ग्रास बन रही है। और यह स्थिति तब है जब खेतीबाड़ी भगवान के भरोसे होने के बावजूद इतना अन्न उपज ही जाता है कि अगले सीजन तक की आधी आबादी का पेट भर जाए। भूख से होने वाली मौत पर एक छोटी-सी जानकारी हमारी आंखें चैंधियाने के लिए काफी है। 

देश में अकाल अब खबर नहीं है। महंगाई विचार विमर्श का मुद्दा नहीं है। इस देश में या तो चर्चा चुनाव पर होता है या फिर परिणाम पर। बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े दावे और उन बातों और दावों की खिल्लियां उड़ाते आंकड़े। मगर, आंकड़ों की परवाह वे करते हैं जो निश्चय के साथ तस्वीरों को बदलने की चेष्टा में जुटे होते हैं। भारत एक ऐसा देश है जो सदियों से कृषि प्रधान देश होने का ‘दंश’ झेल रहा है। मगर इस देश में ना तो अनाज के भंडारण को ले कर विचार विमर्श होता है, न ही अन्न के समान वितरण प्रणाली को सुदृढ बनाने पर ग़ौर किया जाता है। किसानों की मौत की वज़ह तो सबको पता है मगर, उसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की किसी के पास कोई फुर्सत नहीं है। देश में रोजगार बढ़ाने की बातें तो की जा रही है लेकिन महंगाई से नौकरी पेशा से जुड़े लोगों के लिए भी दाल-भात का इंतज़ाम मुश्किल होता जा रहा है, इसकी परवाह किसी को नहीं है। 

देश में स्वस्थ्य रहने के लिए योग की सलाह दी जा रही है। योग कितना जरूरी है, उस पर विचार किया जा रहा है। उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने की कोशिश सफल होती दिख रही है। मगर, हरेक बड़ी इमारत के अगल-बगल में रहने वाले सैड़कों लोग दैनिक आधार पर भूख से दम तोड़ रहे हैं, यह किसी को दिखाई ही नहीं देता। उनके लिए भोजन-भात की चिंता कोई करता नज़र ही नहीं आ रहा। पोषण और कुपोषण की बात तो बहुत बाद की बात है। एक जानकारी के मुताबिक प्रति मिनट 60 व्यक्ति भूख से मर रहे हैं। घंटे के हिसाब से यह आंकड़ा 3600 हो जाता है। दैनिक आधार पर और फिर सालाना का हिसाब किताब खुद लगा लीजिए, क्योंकि यह आंकड़ा कुछ ज़्यादा बड़ा हो जाएगा। 

भूख से होने वाली मौत को रोकने का कोई उपाय नहीं है। और यह यूं ही नहीं है। समाजिक स्तर पर जबर्दस्त असमानता है। राजनैतिक स्तर पर दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी है। योजनाओं के क्रियान्वन में जबर्दस्त घपलेबाजी है। व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं है। अन्न सड़ रहे हैं। सड़ा हुआ अनाज आसपास के माहौल में सड़ांध जरूर पैदा कर रहा है। अनाज लोगों के पेट भरने के लिए होता है और अन्न का एक दाना भी अगर ग्राह्यता के बगैर बर्बाद हो रहा है तो ऐसी व्यवस्था पर लानत है। 


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पूर्णतया सहमत हूँ आपकी बात से, गिरिजा जी । धन्यवाद !

गिरिजा नन्द झा
15 अक्तूबर 2015

कर तो बहुत कुछ सकते हैं. बस इक्छाशक्ति का आभाव है. सरकार से अपेक्षा बेमानी है मगर हम अपने स्तर
पर इतना तो जरूर कर ही सकते हैं, कि खुद के होने पर शर्म महसूस न हो. यह भी काम नहीं है. हर कोई अपनी भूमिका का निर्वाह कर ले तो आधी परेशानी काम हो जाय.

गिरिजा जी, बिल्कुल ठीक कहा आपने ! सच ये भी है कि भूख से मरने वालों का सच हम जानते हैं लेकिन कहीं कोई मर रहा है तो मरे, चलो हम तो बच गए, हमारे सगे संबंधी तो बच गए । हमारी तो आदत है भाई फाइव-स्टार में ही भोज करने की, जितने में हम अकेले खाते और 'पीते' हैं उतने में सौ लोगों का पेट भर तो सकता है लेकिन साहब स्टेटस भी कोई चीज़ होती है कि नहीं ! हमारे तो आँख-कान तभी होते हैं जब आफत ठीक हमारे सिर पर होती है...व्यवस्था बनाने वाले कम और बिगाड़ने वाले ज़्यादा है...आदमी की संवेदना भी दम तोड़ चुकी, अब ऐसे में और क्या कहें गिरिजा जी...

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