दलित नाराज, बचे हैं तीन चरण के मतदान

23 अक्तूबर 2015   |  गिरिजा नन्द झा   (169 बार पढ़ा जा चुका है)

गिरिजा नंद झा

क्या भारतीय जनता पार्टी में अध्यक्ष अमित शाह का दबदबा खत्म होता जा रहा है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘अनुशासनप्रियता’ को जिस तरह से तार-तार किया जा रहा है, उससे तो इसी बात की पुष्टि होती है। मंत्रियों और सांसदों की बढ़ रही ‘बदजुबानी’ से भाजपा की साख मटियामेट होती जा रही है। बिहार विधानसभा चुनाव के तीन चरणों में ‘अप्रत्याशित सफलता’ अर्जित करने के मंसूबों पर तो पानी नहीं बर्फ़ ही डाल दिया गया है। अब तो एनडीए के घटक दलों ने भी भाजपा को आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया है। 


भाजपा खुद को चाहे जितना दिलासा दे ले, मगर पहले दो चरण का मतदान उसके हक़ में नहीं हुआ है। 170 सीटों पर चुनाव जीतने का लक्ष्य नेपथ्य में चला गया है और सामान्य जीत की आस भी मिट्टी में मिलती जा रही है। दो चरण के मतदान को आरक्षण खा गया और बाकी के तीन चरणों में पहले दाल और अब दलित हत्याकांड उसके गले की हड्डी बन गया है। लालू प्रसाद यादव और नीतिश कुमार के राजनैतिक हमले को झेल जाने की क्षमता तो भाजपा में है मगर, अपने ही घटक दलों में बढ़ रही कुलबुलाहट को वह कैसे शांत करेगी, यह किसी को सूझाई ही नहीं दे रहा है। 


दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान को बीच मंझधार में छोड़ने की वज़ह से   प्रधानमंत्री मोदी की अच्छी खासी किरकिरी हो चुकी है। अमित शाह लाख कोशिशों के बावजूद कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय नेता इस बात की शिकायतें ले कर पहुंच रहे हैं कि उन्हें मैदान में उतारने में पार्टी ने बहुत देर कर दी। अब कुछ नहीं हो सकता है और अगर पार्टी को अपेक्षित सीटें नहीं मिलती है तो वे जिम्मेदार नहीं होंगे। इस तरह की निराशाजनक शिकायतों से आजि़ज आ कर अमित शाह ने प्रधानमंत्री मोदी को तो चुनाव प्रचार के लिए जरूर मना लिया है। मगर, हरियाणा में दलितों को जिंदा जला देने के बाद जिस तरह की ‘दयनीय’ स्थितियां भाजपा के लिए पैदा गई है, उसके बीच प्रधानमंत्री मोदी का मन खट्टा हो गया है। 


प्रधानमंत्री मोदी विकास और सिर्फ विकास पर बात करने के लिए बिहार जाने का मन बना चुके थे। तैयारी इस तरह से की कई गई थी कि ‘विवादित’ मुद्दों पर मंुह नहीं खोलना है। घोषणापत्र की गड़बडि़यों पर चर्चा नहीं करनी है। बात शिक्षा की हालत पर होगी। रोजगार की जरूरत पर बल दिया जाएगा। नौजवानों को बेहतर संभावनाएं मुहैया कराने की बात की जाएगी और माहौल को सुधारने के लिए चुस्त दुरुस्त प्रशासनिक इंतज़ाम का भरोसा दिया जाएगा। नौजवानों की सोच और भाजपा को ले कर उनके दृष्टिकोण को भुनाने का प्रयास किया जाएगा मगर, जिस तरह की कानून और व्यवस्था हरियाणा में बिगड़ी हुई है, उसके मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी को यह डर जरूर सताने लगा है कि कहीं भीड़ से मोदी-मोदी की जगह नीतिश कुमार के नारे ना लगने लगे। अभी पिछली रैली में ही अमित शाह को इस अहसज़ स्थिति का सामना करना पड़ गया था। शाह की रैली में लालू प्रसाद यादव जिंदाबाद के नारे लगने शुरू हो गए थे। 


रामविलास पासवान दोहरे आघात में हैं। एक तरफ बिहार विधानसभा चुनाव तो दूसरी तरफ केंद्र में मंत्री बने रहने पर संकट। दलितों पर भाजपा की चिंताजनक टिप्पणी के बाद जितना लंबा वक़्त ले कर उन्होंने आक्रमक रूख अखि़्तयार किया है, वह बिहार के दलित मतदाताओं को रास नहीं आया और जिस तरह का तेवर वह दिखा रहे हैं, उसे भाजपा हज़म नहीं कर पा रही। कुल मिला कर रामविलास पासवान इस बार सबसे ज़्यादा घाटे में नज़र आ रहे हैं। बिहार में तीसरे चरण के मतदान उन इलाकों में होने वाले हैं जहां पर पासवान जीत की बड़ी आस लगाए बैठे थे। मगर, बदली हुई स्थितियां उनके मनोबल को काफी हद तक गिरा दिया है। रही बात जीतन राम मांझी की तो उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए बहुत कुछ। दलितों के नाम पर शहादत देने का जो गीत उन्होंने गाना शुरू कर दिया है, उससे भाजपा का भले ही अच्छा खासा नुकसान हो जाए, मांझी अपनी नैया को तो किनारे लगा ही लेंगे। दलित लालू प्रसाद यादव से खार खाये बैठे हैं और भाजपा में उन्हें अपना भविष्य नज़र नहीं आ रहा। ऐसे में नीतिश कुमार के नाम पर अगर दलित उनके साथ हो लिए तो भाजपा कहीं की नहीं रह जाएगी। संकेत तो कुछ ऐसे ही मिल रहे हैं।


अगला लेख: क्या दिल्ली की गलती को बिहार में दोहरा रही भाजपा?



गिरिजा नन्द झा
24 अक्तूबर 2015

धन्यवाद आपका.

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