लघुकथा- बैल

23 अक्तूबर 2015   |  ओमप्रकाश क्षत्रिय '' प्रकाश -   (211 बार पढ़ा जा चुका है)

लघुकथा- बैल 

हरिया के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई. साहूकार कर्जे में अनाज के साथ बैल भी ले गया. कमल के स्कूल की फीस जमा करना थी और बेटी की शादी भी. इन सब के लिए जरुरी था कि आगामी फसल अच्छी हो. अभी खेत जुताई बाकी थी. इस के लिए बैल चाहिए थे, “ साहूकार बैल देने को तैयार है धनिया. मगर उस की एक शर्त है कि छुटके की बहुरियाँ को बैल के बदले साहूकार के यहाँ काम करना पड़ेगा.”

“ यह क्या कहा रहे हैं कमल के बापू ! आप तो जानते है कि साहूकार चाहता है कि छुटके की बहुरियाँ भी लीला, टीना, झमकू की तरह उस का सबकुछ काम करे,” यह कहते हुए हरिया की पत्नी ने पूछा, “ क्या तू यह सब करना चाहेगी ?”

“ ना जीजी ! हम से यह सब ना होगा.”

“ तो फिर का करे ? कुदाली से खेत खोदे ?”

“ खेती क्या बैल से होवे हैं. वो साहूकार अपनी कुइच्छा का हल अपने बैल पर ही चला ले. हम स्वयम ही बैल बन जाएंगे जीजी,” कहते हुए उस ने स्वाभिमान का जुड़ा अपने हाथों पर उठा लिया.

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स्वाभिमान का जुआ , बहुत सार्थक

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