निस्तब्ध

25 अक्तूबर 2015   |  पुष्पा पी. परजिया   (394 बार पढ़ा जा चुका है)

निशब्द निशांत नीरव अंधकार की निशा में कुछ

शब्द बनकर मन में आ जाए,

जब हिरदय इस सृष्टि पर एक विहंगम दृष्टि कर जाये

भीगी पलके लिए नैनो में रैना निकल जाये

विचार पुष्प पल्लवित हो मन को मगन कर जाये


दूर गगन छाई तारों की लड़ी जो

रह रह कर मन को ललचाये

ललक उठे है एक ,मन में मेरे

बचपन का भोलापन फिर से मिल जाये

मीठे सपने मीठी बातें था मीठा जीवन तबका

क्लेश कलुष बर्बरता का न था कोई स्थान वहां

थे निर्मल, निलिप्त द्वन्दो से, छल का नामो निशा ना था

निस्तब्ध निशा कह रही मानो मुझसे ,

तू शांति के दीप जला ् इंसा जूझ रहा

जीवन से हर पल उसको तू ढाढ़स बंधवा

निर्मल कर्मी बनकर इंसा के जीवन को

फिर से बचपन दे दे जरा








अल्हड़ बचपन की स्मृतियों की ओर ले जाती एक अलंकारबध्य रचना.
एक अनुरोध है शब्द धाडस को ढाढ़स में बदलने की कृपा करें. कीबोर्ड पर कई विकल्प होते हैं.

कविता को इतने ध्यान से पढ़ा आपने आभारी हूँ. जी अपनी त्रुटियों को अवश्य सुधारुंगी हार्दिक आभार सह धन्यवाद रवीन्द्रसिंह यादव जी

सच कहा आपने प्रियंका जी बचपन इंसान की उम्र का सबसे प्यारा भाग है जिसमे कोई अवगुण, नहीं सिर्फ सद्गुण ही होते हैं जो हम बच्चों के साथ रहकर ही प्राप्त कर सकते हैं पर आज के इंसान में अच्छे गुणों की कमी आ रही है हार्दिक आभार सह बहुत बहुत धन्यवाद प्रियंका जी

वर्तिका जी आप खुद इतना अच्छा लिखते हो और मेरी रचनाएँ आपको प्रभावित करती है ये सच मेरा बहुत bada सौभाग्य है हार्दिक धन्यवाद ।.

आपको ये कविता पसंद आई इसके लिए हार्दिक आभार सह बहुत बहुत धन्यवाद चंद्रेश जी तथा शब्द नगरी संगठन ।...

प्रियंका शर्मा
26 अक्तूबर 2015

बचपन तो वापस नहीं आ सकता , लेकिन अपनी २ साल की छोटी सी भतीजी के साथ जब जब खेलती हूँ तो लगता है की बचपन लौट आया है ....
बसऐसे ही बचपन वापस आ सकता है ।

वर्तिका
26 अक्तूबर 2015

धन्यवाद! पुष्पा जी, आपकी रचनायें निरंतर प्रभावित करती हैं!

शब्दों की सुन्दर चयन से युक्त अति उत्तम रचना के लिए शब्दनगरी आपको धन्यवाद देता है |

हार्दिक आभार सह धन्यवाद वर्तिका जी, सदा की तरह आपके विचारों ने मुझे आगे लिखने का प्रोत्साहन दिया है .

वर्तिका
26 अक्तूबर 2015

उत्तम कविता पुष्पा जी! काश, बचपन का भोलापन फिर से मिल जाये!

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